
केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने कॉलेजियम व्यवस्था पर उठाए सवाल, बोले- यह लोकतंत्र के लिए धब्बा'
नई दिल्ली। भारत की कानून व्यवस्था विश्व की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्थाओं में से एक है और अदालतों में होने वाली निर्णय प्रक्रिया विश्वभर में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। लेकिन इसी वर्ष देश की सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठ जजों ने जब प्रेस वार्ता कर अपनी समस्याओं को देश की जनता के सामने रखा तब चारों ओर जैसे कोहराम मच गया। आजाद भारत में यह पहली बार हो रहा था कि सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ जज मीडिया के सामने आकर न्याय की गुहार लगा रहे हों। लेकिन अब मोदी सरकार के एक मंत्री ने ही जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया अर्थात कॉलेजियम व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी सरकार के एक मंत्री ने कॉलोजियम सिस्टम की कड़ी आलोचना की है और कहा है कि जजों की नियुक्ति की यह व्यवस्था लोकतंत्र पर एक धब्बा है।
कॉलेजियम व्यवस्था में जजों की योग्यता को नजरअंदाज किया जाता है: कुशवाहा
आपको बता दें कि केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि देश की न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम व्यवस्था ठीक नहीं है। उन्होंने कहा कि लोग आरक्षण का विरोध करते हैं। ऐसे लोगों का कहना है कि आरक्षण के कारण मेरिट की अवहेलना होती है, लेकिन मैं समझता हूं कि कॉलेजियम व्यवस्था में जजों की योग्यता को नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने सवाल पूछते हुए कहा कि एक चाय बेचने वाला व्यक्ति देश का प्रधानमंत्री बन सकता है, एक मछुआरे का बेटा वैज्ञानिक बनकर देश का राष्ट्रपति बन सकता है, लेकिन क्या एक नौकरानी का बेटा या बेटी जज बन सकता है? उन्होंने कहा कि कॉलेजियम व्यवस्था हमारे देश के लिए और एक लोकतांत्रिक देश के लिए धब्बा है। आपको बता दें कि राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा का बयान ऐसे समय में आया है जबकि कुछ सप्ताह पहले ही कॉलेजियम ने सर्वोच्च अदालत में जजों की नियुक्ति की सिफारिश की है। इनमें से उत्तराखंड के मुख्यन्यायधीश केएम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जज बनाने को लेकर विवाद बढ़ गया था।
2015 में संविधान पीठ ने नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक करार दिया था
आपको बता दें कि पटना में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय राज्यमंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने जजों पर अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करने का आरोप लगाया और कहा कि मौजूदा समय में जजों के रवैये को देखते हुए एसा लगता है कि न्यायाधीश दूसरे जजों की नियुक्ति नहीं करते हैं बल्कि वे अपना उत्तराधिकारी चुन रहे होते हैं। उन्होंने सवाल पूछा कि आखिर जजों को ऐसा क्यों करना चाहिए? आखिर उत्तराधिकारी नियुक्त करने की व्यवस्था क्यों बनाई गई? आपको बता दें कि केंद्र सरकार ने कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया था। आयोग को अधिकार दिए गए हैं कि वे जजों की नियुक्ति के अलावा उनके तबादले भी कर सकते हैं। इस आयोग में कुछ 6 सदस्यों की व्यव्सथा की गई थी। लेकिन 2015 में नियुक्ति आयोग की संवैधानिकता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और शीर्ष अदालत की संविधान पीठ ने नियुक्ति आयोग को असंवैधानिक करार देते हुए उसे निरस्त कर दिया। सबसे बड़ी बात यह थी कि नियुक्ति आयोग पर फैसला करने वाली संविधान पीठ में शामिल जजों में से सिर्फ जस्टिस जस्ती चेलामेश्वर ने ही इसका समर्थन किया था।
Published on:
06 Jun 2018 03:59 pm
बड़ी खबरें
View Allविविध भारत
ट्रेंडिंग
