प्रतापगढ़। कांठल क्षेत्र में मसूर की खेती लगातार संकट में है। रसायनों के बढ़ते उपयोग, मौसम की मार और घटती उपज के कारण किसानों की आय प्रभावित हो रही है। 10 वर्षों में बाहर भेजी जाने वाली मसूर की मात्रा 88% तक गिर गई।
प्रतापगढ़। कांठल क्षेत्र में प्रमुख दलहन फसल मसूर की खेती पर पिछले कुछ वर्षों से संकट गहराता जा रहा है। प्राकृतिक प्रकोप और खेती के बिगड़ते स्वरूप के कारण उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में गिरावट दर्ज हो रही है। इसका सीधा असर किसानों की आय पर पड़ रहा है, वहीं मंडियों में मसूर की आवक भी लगातार कम होती जा रही है। कांठल की जलवायु लंबे समय तक मसूर उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती रही है।
यहां उत्पादित मसूर का दाना मोटा और स्वादिष्ट होने के कारण प्रदेश के कई जिलों के साथ नई दिल्ली, उत्तर प्रदेश, दक्षिण भारत और पश्चिम बंगाल तक इसकी मांग रहती थी। लेकिन हाल के वर्षों में उत्पादन घटने से बाहरी मांग भी प्रभावित हुई है। खेती विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक आपदाओं के साथ साथ खेतों में रसायनों के बढ़ते उपयोग ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। कीटनाशक और खरपतवार नाशक दवाओं का अत्यधिक प्रयोग तथा एक ही फसल की बार-बार बुवाई से जमीन की उर्वरता प्रभावित हो रही है। इसका नकारात्मक असर मसूर की फसल पर स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
कृषि विभाग उप निदेशक आत्मा गोपालनाथ योगी ने बताया कि किसानों को अब पारंपरिक और जैविक खेती की ओर रुख करना होगा। रसायनों का सीमित उपयोग और फसल चक्र अपनाने से ही मसूर की गुणवत्ता और उत्पादन में सुधार संभव है।
प्रतापगढ़ के कांठल क्षेत्र में मसूर की विशेषता यह रही है कि यहां बारिश के कारण खेतों में लंबे समय तक नमी बनी रहती है। ऐसे में एक या दो बार सिंचाई पर्याप्त होती है, वहीं मावठ होने पर सिंचाई की आवश्यकता भी नहीं रहती। यही कारण है कि यहां की मसूर स्वाद और गुणवत्ता में अलग पहचान रखती रही है। लेकिन वर्तमान हालात में उत्पादन घटने से किसानों का रुझान भी इस फसल से कम हो रहा है। यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में मसूर की खेती और अधिक प्रभावित हो सकती है।
कृषि मंडी सूत्रों के अनुसार कांठल क्षेत्र से बाहर भेजी जाने वाली मसूर की मात्रा में लगातार गिरावट दर्ज हुई है। वर्ष 2015 में 77552 क्विंटल मसूर बाहर भेजी गई थी, जो 2016 में बढ़कर 85842 क्विंटल तक पहुंची। इसके बाद गिरावट का दौर शुरू हुआ और 2017 में 74258, 2018 में 75284, 2019 में 65874 और 2020 में 68425 क्विंटल रही। आंकड़ों के अनुसार 2021 में यह घटकर 58745, 2022 में 50293 और 2023 में 45817 क्विंटल रह गई। वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 34920 क्विंटल तक गिर गया और 2025 में केवल 9300 क्विंटल मसूर ही बाहर भेजी जा सकी।
| वर्ष | बाहर भेजी गई मात्रा (क्विंटल में) |
|---|---|
| 2015 | 77,552 |
| 2016 | 85,842 |
| 2017 | 74,258 |
| 2018 | 75,284 |
| 2019 | 65,874 |
| 2020 | 68,425 |
| 2021 | 58,745 |
| 2022 | 50,293 |
| 2023 | 45,817 |
| 2024 | 34,920 |
| 2025 | 9,300 (आंकड़े कृषि मंडी सूत्रों के अनुसार) |