इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बालिग जोड़ों की शादी में पुलिस हस्तक्षेप पर कड़ी टिप्पणी करते हुए एक अपहरण केस की एफआईआर रद्द कर दी।
Prayagraj News: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि पुलिस का काम केवल अपराधों की जांच करना है, न कि बालिग जोड़ों की शादियों की जांच करना या उनका पीछा करना। अदालत ने यह भी कहा कि जब कोई व्यक्ति बालिग हो जाता है, तो उसे अपने जीवन के फैसले खुद लेने का अधिकार होता है। इस मामले में, कोर्ट ने एक प्राथमिकी (एफआईआर) को रद्द करते हुए पुलिस को निर्देश दिया कि इस प्रकार के मामलों में हस्तक्षेप न करें।
यह मामला सहारनपुर जिले के थाना सदर बाजार का है, जहां एक पिता ने अपनी बालिग बेटी का अपहरण करने और उसे शादी के लिए मजबूर करने का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी दर्ज कराई थी। आरोपी ने इस एफआईआर को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद एफआईआर को पूरी तरह से रद्द कर दिया और पुलिस को निर्देश दिए कि इस विवाहित जोड़े के जीवन में कोई भी हस्तक्षेप न करें। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव को तत्काल कार्रवाई करने का आदेश भी दिया।
कोर्ट ने यह पाया कि युवती बालिग थी और उसने अपनी मर्जी से अपने साथी के साथ मंदिर में शादी की थी। विवाह प्रमाणपत्र और तस्वीरें भी कोर्ट में प्रस्तुत की गईं। इसके बावजूद पुलिस ने गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया और जोड़े को परेशान करना शुरू कर दिया। कोर्ट ने हैरानी जताई कि इस मामले में केवल गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज की जा सकती थी, लेकिन पुलिस ने इसे एक गंभीर अपराध बना दिया।
कोर्ट ने पुलिस की कार्रवाई को व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर गंभीर हमला माना। कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान किसी भी बालिग को यह अधिकार देता है कि वह अपनी इच्छानुसार अपने जीवन साथी का चयन करे और अपने जीवन के फैसले खुद ले। कोर्ट ने यह भी चिंता व्यक्त की कि इस प्रकार के मामलों में पुलिस की कार्रवाई से अदालतों में अनावश्यक बोझ बढ़ रहा है, जिससे न्यायिक व्यवस्था पर असर पड़ रहा है।