High Court big decision regarding maintenance: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने डॉक्टर पत्नी की भरण पोषण भत्ता की मांग को खारिज कर दिया। अपने आदेश में अदालत ने कहा कि डॉक्टर पत्नी काम करके इनकम करें।
Allahabad High Court big decision, able-bodied women will not get maintenance allowance: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भरण पोषण को लेकर बड़ा आदेश दिया है। अपने आदेश में हाई कोर्ट ने कहा है कि सक्षम जीवनसाथी को जानबूझकर काम न करने और दूसरों पर आर्थिक बोझ डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। मामला डॉक्टर दंपत्ति से जुड़ा है, जिसमें पत्नी ने पति से भरण पोषण की मांग करते हुए अपील की थी। जिसे हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया। पत्नी की बेरोजगारी को अदालत ने स्वैच्छिक बेरोजगारी बताया।
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फर्स्ट अपील नंबर 594/2025 में सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। अपीलकर्ता डॉक्टर गरिमा दुबे बनाम डॉक्टर सौरभ आनंद दुबे के मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी शिक्षा, अनुभव और पेशेवर योग्यता से पर्याप्त आय अर्जित करने में सक्षम है और जानबूझकर काम ना करे, इसके बाद पति से भरण पोषण भत्ता मांग कर उस पर आर्थिक बोझ डाले।
अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत भरण पोषण देने की मांग को अदालत खारिज कर सकती है। इस संबंध में अदालत में डॉक्टर गरिमा द्विवेदी दुबे के आयकर दस्तावेजों का भी उल्लेख किया गया।
अदालत ने उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर बताया कि दस्तावेजों से जानकारी मिली कि डॉ गरिमा दुबे की सालाना इनकम पहले 31 लाख रुपए से अधिक रह चुकी है और वह स्त्री रोग विशेषज्ञ (एमडी) है। अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर अपने क्षेत्र में अच्छी आय अर्जित कर सकती है। ऐसे में भरण पोषण तय करते समय पेशेवर क्षमता को नजअंदाज नहीं किया जा सकता है।
डॉक्टर गरिमा दुबे ने अदालत में जानकारी दी कि वर्तमान समय में वह बेरोजगार है, कोई काम नहीं कर रही है। इस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि डॉक्टर गरिमा दुबे की बेरोजगारी को स्वैच्छिक बेरोजगारी बताया। कहा वह अपनी इच्छा से बेरोजगार है। सक्षम व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए। इसके साथ ही डॉक्टर गरिमा दुबे की अंतरिम भरण पोषण की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया।