Magh Mela 2026 Special: 22 वर्षीय अमर कलम रस्तोगी, जो रायबरेली के रहने वाले हैं, मानसिक तनाव और डिप्रेशन के कारण आत्महत्या के विचार से प्रयागराज पहुंचे।
Prayagraj Magh Mela 2026 Special: संगम नगरी प्रयागराज में इन दिनों माघ मेला चल रहा है। इस मेले में देश के अलग-अलग हिस्सों से साधु-संत और श्रद्धालु पहुंचे हैं। इसी बीच माघ मेले में एक ऐसे युवा संत को देखा गया, जिसने बहुत कम उम्र में सांसारिक जीवन छोड़कर संन्यास अपना लिया। यह युवा संत मात्र 22 वर्ष के हैं और उनका नाम अब यश्वनी दास है।
गंगा स्नान के बाद जब यश्वनी दास मीडिया से बातचीत की गई, तो उन्होंने बताया कि संन्यास लेने से पहले उनका नाम अमर कलम रस्तोगी था। वह उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के रहने वाले हैं। उनका जीवन बाहर से सामान्य और संपन्न दिखाई देता था, लेकिन अंदर ही अंदर वह काफी परेशान थे।
यश्वनी दास ने बताया कि वह कुछ समय से डिप्रेशन में चल रहे थे। मन में गहरी निराशा थी और जीवन से हार मान चुके थे। इसी मानसिक स्थिति में वह घर से निकल पड़े। उनका इरादा आत्महत्या करने का था और भटकते हुए वह प्रयागराज के माघ मेले तक पहुंच गए। माघ मेले में संगम तट पर उनकी मुलाकात एक अनजान संन्यासी से हुई। उस संन्यासी ने उन्हें अपने साथ एक शिविर में ले गया। वहां कुछ लोगों ने उनके पैर छुए और आशीर्वाद लिया। यह देखकर उन्हें अजीब सा अनुभव हुआ। जब वह गंगा किनारे खड़े हुए, तो उन्हें ऐसा लगा जैसे ईश्वर के साक्षात दर्शन हो गए हों। इसी पल उनके मन में वैराग्य का भाव जाग उठा और आत्महत्या का विचार खत्म हो गया।
इसके बाद अमर कलम रस्तोगी खाक चौक स्थित वैष्णव संन्यासी संतोष दास 1008 के शिविर में पहुंचे। यहां उन्होंने कई दिन बिताए। धीरे-धीरे उनका मन पूरी तरह संन्यास की ओर रम गया। उन्होंने महंत संतोष दास 1008 से शिष्य बनने की इच्छा जताई। गुरु ने भी उन्हें स्वीकार कर लिया। गुरु से दीक्षा लेने के बाद उनका नाम बदलकर यश्वनी दास रख दिया गया। इसके साथ ही उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। माघ मेले में ही उन्होंने संन्यासी जीवन की शुरुआत कर दी।
यश्वनी दास का कहना है कि उनके पास पहले करोड़ों की चल-अचल संपत्ति थी, लेकिन उन्होंने सब कुछ छोड़ दिया। अब उनके पास सिर्फ कुछ कपड़े और गले में कंठ माला है। उनके परिवार में माता-पिता, भाई और बहन हैं, लेकिन उनका कहना है कि नियति ने उनके लिए यही रास्ता चुना था। यश्वनी दास कहते हैं कि संन्यास के मार्ग पर उन्हें सच्ची शांति मिली है। अब वह जीवन भर संत ही रहना चाहते हैं। न वह गृहस्थ जीवन में लौटेंगे और न ही विवाह करेंगे। उनका जीवन अब संतों की सेवा और अध्यात्म को समर्पित है।