Dhirendra Shastri Urges Dialogue Amid Shankaracharya: प्रयागराज माघ मेले में ज्योतिष पीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच चल रहे विवाद पर बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि दोनों पक्ष सनातनी हैं और आपसी संवाद से समाधान निकालना चाहिए, ताकि सनातन धर्म का हास-परिहास न हो।
Dhirendra Shastri Magh Mela Controversy Statement: प्रयागराज में चल रहे माघ मेले के दौरान ज्योतिष पीठ शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद और मेला प्रशासन के बीच उत्पन्न विवाद पर अब संत समाज की प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। इस मामले में बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने संतुलित और संयमित बयान देते हुए दोनों पक्षों से आपसी संवाद और समझौते की अपील की है। उन्होंने कहा कि इस पूरे घटनाक्रम से सनातन धर्म का हास-परिहास नहीं होना चाहिए और किसी भी विवाद का समाधान आपसी बातचीत से निकाला जाना चाहिए।
आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने स्पष्ट किया कि उन्हें इस पूरे मामले की पूरी जानकारी नहीं है, क्योंकि वे स्वयं प्रयागराज नहीं जा सके। हालांकि सोशल मीडिया और समाचार माध्यमों के जरिए जो बातें सामने आई हैं, उसके आधार पर उन्होंने यह राय रखी कि दोनों पक्ष सनातनी हैं और किसी भी स्थिति में टकराव से बचना चाहिए।
बागेश्वर धाम आचार्य ने कहा कि प्रयागराज में शंकराचार्य जी के साथ जो घटना हुई है, उसकी मुझे पूरी जानकारी नहीं है। मैं स्वयं वहां नहीं जा पाया। लेकिन सोशल मीडिया पर जो कुछ देखा और सुना, उसके आधार पर इतना जरूर कहूंगा कि सनातन का हास-परिहास नहीं होना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे आयोजनों में संत समाज और प्रशासन दोनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है और किसी भी तरह का टकराव सनातन परंपराओं की गरिमा को ठेस पहुंचाता है।
आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने विवाद को लेकर स्पष्ट रूप से कहा कि शंकराचार्य और मेला प्रशासन दोनों ही सनातन परंपरा के अंग हैं। दोनों हमारे अपने हैं। दोनों सनातनी हैं। ऐसे में टकराव की बजाय संवाद का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। दोनों पक्ष आपस में बैठकर समझौता करें और बीच का रास्ता निकालें,” उन्होंने कहा। उनका कहना था कि सनातन धर्म की परंपरा संवाद, सहमति और समन्वय पर आधारित रही है। किसी भी विवाद को सार्वजनिक टकराव का रूप देना न तो धर्म के हित में है और न ही समाज के।
धीरेंद्र शास्त्री ने अप्रत्यक्ष रूप से सोशल मीडिया पर हो रही बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप की ओर भी इशारा किया। उन्होंने कहा कि आज के दौर में किसी भी घटना को सोशल मीडिया पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है, जिससे विवाद और गहराता चला जाता है। सनातन का हंसी-मजाक बनाने से किसी को कोई फायदा नहीं है। इससे न समाज को लाभ होता है और न ही धर्म की प्रतिष्ठा बढ़ती है,” उन्होंने कहा।
प्रयागराज का माघ मेला सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण आयोजन माना जाता है। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम पर आस्था की डुबकी लगाने पहुंचते हैं। संत समाज, अखाड़े और धार्मिक संस्थाएं इस मेले का अभिन्न हिस्सा होती हैं। ऐसे में शंकराचार्य जैसे उच्च धार्मिक पद पर आसीन संत और प्रशासन के बीच विवाद होना श्रद्धालुओं और समाज के लिए भी चिंता का विषय बन गया है।
आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने अपने बयान के माध्यम से संत समाज की एकजुटता पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि सनातन धर्म की शक्ति उसकी एकता में निहित है। उन्होंने कहा कि अगर हम आपस में ही उलझेंगे, तो इसका लाभ वे लोग उठाएंगे जो सनातन परंपराओं के विरोधी हैं। उनका मानना है कि आंतरिक मतभेदों को सार्वजनिक विवाद का रूप देने से बचना चाहिए और परंपरागत मर्यादाओं का पालन करते हुए समाधान निकालना चाहिए।
धार्मिक जानकारों का कहना है कि इस तरह के विवादों से आम श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति पैदा होती है। श्रद्धालु संतों को मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं और जब संत समाज और प्रशासन आमने-सामने आते हैं, तो इसका असर धार्मिक वातावरण पर पड़ता है। धीरेंद्र शास्त्री का यह बयान इसी पृष्ठभूमि में महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि उन्होंने टकराव के बजाय संतुलन और समझौते का रास्ता सुझाया है।
इस पूरे मामले को लेकर यह सवाल भी उठ रहा है कि बड़े धार्मिक आयोजनों में धर्म और प्रशासन के बीच समन्वय कितना जरूरी है। विशेषज्ञों का मानना है कि प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह संत समाज की गरिमा और धार्मिक परंपराओं का सम्मान करे, वहीं संत समाज की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वह व्यवस्थाओं को समझे और संवाद बनाए रखे।
बागेश्वर धाम आचार्य धीरेंद्र शास्त्री के इस संयमित और संतुलित बयान के बाद यह उम्मीद जताई जा रही है कि दोनों पक्ष विवाद को आगे बढ़ाने के बजाय बातचीत के जरिए समाधान निकालेंगे। संत समाज के कई लोग इस बयान को सकारात्मक पहल मान रहे हैं।
अपने बयान के अंत में आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने कहा कि सनातन धर्म केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि मर्यादा, सहिष्णुता और आपसी सम्मान की परंपरा है। “सनातन का हंसी-मजाक बनने से बचाना हम सभी की जिम्मेदारी है,” उन्होंने कहा।