
Justice Yashwant Varma Cash Case:जस्टिस यशवंत वर्मा का नाम पिछले करीब डेढ़ साल से देश की न्यायपालिका से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में रहा है। वजह मार्च 2025 में दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास के स्टोर रूम में आग लगने के बाद बड़ी मात्रा में जले, अधजले और गीले नोटों का मिलना था। अब इस मामले में नया मोड़ आया है।
लोकसभा में बुधवार, 12 अगस्त 2026 को पेश की गई जांच समिति की रिपोर्ट में उनके खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों को साबित माना गया है। हालांकि, समिति ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी रिपोर्ट नकदी के व्यक्तिगत आपराधिक स्वामित्व का निष्कर्ष नहीं देती। लेकिन आखिर जस्टिस यशवंत वर्मा कौन हैं, जिनका नाम इस विवाद से पहले भी कई महत्वपूर्ण अदालती फैसलों के कारण चर्चा में रहा है?
जस्टिस यशवंत वर्मा का जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हुआ था। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी के हंसराज कॉलेज से बीकॉम ऑनर्स किया और इसके बाद मध्य प्रदेश की रीवा यूनिवर्सिटी से एलएलबी की पढ़ाई पूरी की। 8 अगस्त 1992 को उन्होंने बतौर वकील अपना करियर शुरू किया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में वकालत के दौरान उनका काम मुख्य रूप से संवैधानिक कानून, श्रम एवं औद्योगिक विवाद, कॉरपोरेट कानून, टैक्सेशन और पर्यावरण से जुड़े मामलों में रहा। 2006 से जज बनने तक वह इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्पेशल काउंसल भी रहे। इसके अलावा 2012 से अगस्त 2013 तक उत्तर प्रदेश सरकार के चीफ स्टैंडिंग काउंसल के पद पर भी रहे।
कानूनी क्षेत्र में दो दशक से ज्यादा का अनुभव हासिल करने के बाद 13 अक्टूबर 2014 को उन्हें इलाहाबाद हाईकोर्ट का अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त किया गया। करीब डेढ़ साल बाद, 1 फरवरी 2016 को उन्होंने स्थायी न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। इसके बाद 11 अक्टूबर 2021 को उनका तबादला दिल्ली हाईकोर्ट कर दिया गया। दिल्ली हाईकोर्ट में भी उन्होंने कई महत्वपूर्ण मामलों की सुनवाई की। इनमें ईडी की शक्तियों, आयकर विवाद, दिल्ली आबकारी नीति मामले से जुड़े मामलों और रेस्टोरेंट सर्विस चार्ज जैसे विषय शामिल रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट में रहते हुए जस्टिस वर्मा ने 2018 में डॉ. कफील खान को जमानत दी थी। यह मामला 2017 में गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन आपूर्ति बाधित होने के बाद बच्चों की मौत से जुड़ा था। अदालत ने उस समय रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री के आधार पर चिकित्सीय लापरवाही साबित करने वाली पर्याप्त सामग्री नहीं पाई थी। इसी तरह जनवरी 2023 में दिल्ली हाईकोर्ट में जस्टिस वर्मा की एकल पीठ ने ईडी की जांच शक्तियों को लेकर अहम फैसला दिया था। इसके अलावा कांग्रेस की आयकर संबंधी याचिका और दिल्ली शराब नीति मामले से जुड़े मामलों में भी वह सुनवाई कर चुके हैं।
पूरे मामले की शुरुआत 14 मार्च 2025 को दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में आग लगने से हुई। आग बुझाने पहुंचे कर्मचारियों के सामने स्टोर रूम में कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिली। बाद की जांच में जले, अधजले, गीले और बिखरे हुए ₹500 के नोटों का जिक्र सामने आया। जस्टिस वर्मा ने नकदी से किसी भी तरह का संबंध होने से इनकार किया था। उनका कहना था कि जिस स्टोर रूम में नकदी मिली, वह मुख्य आवास से अलग था और उनके परिवार ने वहां कभी नकदी नहीं रखी। उन्होंने मामले में साजिश की आशंका भी जताई थी।
विवाद सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने उन्हें दिल्ली हाईकोर्ट से वापस उनके मूल हाईकोर्ट यानी इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजने की सिफारिश की। 5 अप्रैल 2025 को उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में फिर शपथ ली। हालांकि, विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ।बाद में जस्टिस वर्मा ने 10 अप्रैल 2026 को न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया। उनके खिलाफ जांच जारी रही।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अगस्त 2025 में Judges (Inquiry) Act, 1968 के तहत जांच समिति गठित की थी। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार ने की। इसमें तत्कालीन बॉम्बे हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और वरिष्ठ अधिवक्ता बीवी आचार्य भी शामिल थे। समिति ने अपनी रिपोर्ट 18 मई 2026 को लोकसभा अध्यक्ष को सौंप दी थी, जिसे 12 अगस्त 2026 को लोकसभा में पेश किया गया।
सरकारी आवास में बड़ी मात्रा में अस्पष्ट/अनएक्सप्लेंड नकदी मिलना। बरामद नकदी और घटनास्थल से जुड़े साक्ष्यों को सुरक्षित न रखा जाना। नकदी मिलने की परिस्थितियों पर जस्टिस वर्मा की सफाई को समिति द्वारा असंतोषजनक और भ्रामक माना जाना।समिति ने तीनों आरोपों को साबित माना, लेकिन साथ ही यह महत्वपूर्ण बात भी कही कि रिपोर्ट यह निष्कर्ष नहीं देती कि नोटों का व्यक्तिगत आपराधिक स्वामित्व जस्टिस वर्मा का था। समिति के अनुसार, जो बात स्थापित हुई वह यह है कि पर्याप्त मात्रा में अस्पष्ट नकदी उनके कब्जे वाले आधिकारिक परिसर में मिली और वह उसकी मौजूदगी, स्रोत या स्वामित्व के बारे में संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे सके।
जस्टिस यशवंत वर्मा का करियर तीन दशक से ज्यादा लंबे कानूनी सफर का रहा है। प्रयागराज से वकालत शुरू करके इलाहाबाद हाईकोर्ट, फिर दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुंचे वर्मा ने कई चर्चित मामलों में फैसले दिए। लेकिन मार्च 2025 में सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिले नोटों ने उनके लंबे न्यायिक करियर को एक बड़े विवाद के केंद्र में ला दिया। अब लोकसभा में पेश जांच रिपोर्ट ने इस मामले को एक और महत्वपूर्ण मोड़ दे दिया है।