प्रयागराज माघ मेले में आस्था के साथ संस्कृति और संगीत का अद्भुत संगम देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित ‘कला संगम’ कार्यक्रम की शुरुआत शास्त्रीय और लोक कलाओं की मनमोहक प्रस्तुतियों से हुई, जिसने श्रद्धालुओं और दर्शकों को भाव-विभोर कर दिया।
Magh Mela Witnesses Cultural Confluence: प्रयागराज के पावन संगम तट पर लगने वाला माघ मेला केवल आस्था और स्नान का पर्व नहीं, बल्कि भारतीय सनातन परंपरा, सांस्कृतिक विरासत और लोक कलाओं का जीवंत उत्सव भी है। इसी भाव को साकार करता हुआ माघ मेला क्षेत्र में ‘कला संगम’ सांस्कृतिक कार्यक्रम शनिवार से भव्य रूप से आरंभ हो गया। उत्तर प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम में शास्त्रीय और लोक संगीत, नृत्य व गायन की त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है, जिसने मेला क्षेत्र को सांस्कृतिक रंगों से सराबोर कर दिया है।
माघ मेला क्षेत्र के परेड ग्राउंड में आयोजित कला संगम कार्यक्रम का उद्देश्य देश की समृद्ध लोक एवं शास्त्रीय कलाओं को जन-जन तक पहुंचाना है। इस आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं और पर्यटकों को जहां एक ओर आध्यात्मिक वातावरण का अनुभव हो रहा है, वहीं दूसरी ओर भारतीय संस्कृति की विविधता और कलात्मक ऊंचाइयों से भी वे रूबरू हो रहे हैं। उत्तर प्रदेश के संस्कृति विभाग की इस पहल को माघ मेले की सांस्कृतिक पहचान को और सशक्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
माघ मेला अधिकारी ऋषिराज ने बताया कि कला संगम कार्यक्रम 4 जनवरी से 30 जनवरी तक आयोजित किया जाएगा, जिसमें कुल 20 दिनों तक 120 से अधिक लोक एवं शास्त्रीय कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देंगे। इस दौरान प्रतिदिन संगीत, नृत्य और लोक कलाओं से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिससे माघ मेला क्षेत्र लगातार सांस्कृतिक गतिविधियों से गुलजार रहेगा। उन्होंने कहा कि माघ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने का भी मंच है। कला संगम के माध्यम से हम प्रदेश और देश के श्रेष्ठ कलाकारों को श्रद्धालुओं के बीच प्रस्तुत कर रहे हैं।”
कला संगम के शुभारंभ के दिन कुल छह सांस्कृतिक प्रस्तुतियां हुईं, जिन्होंने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। कार्यक्रम की शुरुआत उदय चंद्र परदेशी एवं उनकी टीम द्वारा प्रस्तुत देवी लोकगीतों से हुई। लोकगीतों की सजीव प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय बना दिया। इसके बाद मंच पर आईं लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी, जिनके भजनों ने श्रोताओं को भाव-विभोर कर दिया। उनके स्वर में भक्ति, परंपरा और लोकसंस्कृति की मिठास स्पष्ट झलक रही थी। जैसे ही उन्होंने भजन प्रस्तुत किए, पूरा पंडाल तालियों और श्रद्धा से गूंज उठा।
कार्यक्रम में वाराणसी से आए राम जनम और उनकी टीम द्वारा किया गया शंख वादन विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। शंख की गूंज ने संगम तट के आध्यात्मिक वातावरण को और अधिक पवित्र कर दिया। शंखनाद के साथ उपस्थित श्रद्धालुओं ने इसे दिव्य अनुभूति बताया। लोक गायन की कड़ी में संगीता मिश्रा ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों का मन मोह लिया। वहीं, लखनऊ से आए वरुण मिश्रा की शास्त्रीय गायन प्रस्तुति ने संगीत प्रेमियों को रागों की दुनिया में ले जाने का काम किया। उनकी प्रस्तुति को श्रोताओं ने खूब सराहा।
पहले दिन के कार्यक्रम में केवल संगीत ही नहीं, बल्कि नृत्य कलाओं का भी सुंदर संगम देखने को मिला। कीर्ति श्रीवास्तव द्वारा प्रस्तुत लोक नृत्य ‘डेढ़इया’ ने दर्शकों को लोक संस्कृति की जड़ों से जोड़ा। वहीं, नीता जोशी के कथक नृत्य की प्रस्तुति ने शास्त्रीय नृत्य की गरिमा और सौंदर्य को मंच पर साकार किया। लोक नृत्य और कथक की इस जुगलबंदी ने यह संदेश दिया कि भारतीय संस्कृति में विविधता के बावजूद एकता की भावना सदैव विद्यमान रहती है।
पूरे कार्यक्रम का सशक्त और प्रभावी संचालन आभा मधुर द्वारा किया गया, जिन्होंने कलाकारों का परिचय देते हुए दर्शकों को कार्यक्रम से लगातार जोड़े रखा। मंच सज्जा, ध्वनि व्यवस्था और प्रकाश संयोजन भी दर्शकों को आकर्षित करने वाला रहा। श्रद्धालुओं और स्थानीय लोगों ने संस्कृति विभाग और मेला प्रशासन की इस पहल की सराहना की। लोगों का कहना है कि संगम स्नान के साथ-साथ इस तरह के सांस्कृतिक कार्यक्रम माघ मेले के अनुभव को और भी यादगार बना देते हैं।