होली की मस्ती के जितने रंग है, उतनी ही अनोखी इसे मनाने की परम्पराएं भी हैं। संगमनगरी प्रयागराज में होली की अजीबो गरीब परंपरा है हथौड़े बारात की है। अनूठी परंपरा वाली इस शादी में दूल्हा होता है एक भारी-भरकम हथौड़ा, इसके बाद हथौड़े की बारात निकालने से पहले होता है कद्दू भंजन होता है।
प्रयागराज: बारात का नाम लेते ही दिमांग में दूल्हे की तस्वीर बन जाती है। लेकिन आज हम आप को ऐसी बारात में लेकर चलते हैं जिसे जानकर आप सोचने को मजबूर हो जाएंगे और कहेंगे कि आखिर यह किस तरह की बारात और शादी है। इस बारात में दूल्हा नहीं बल्कि भारी भरकम हथौड़े की बारात निकाली जाती है। संगमनगरी कहे जाने वाले प्रयागराज की ये परंपरा है, जहां होलिका दहन होने से पहले शहर की सड़कों पर पूरे विधि-विधान के साथ हथौड़े की बारात निकाली जाती है। होली की मस्ती के जितने रंग है, उतनी ही अनोखी इसे मनाने की परम्पराएं भी हैं। संगमनगरी प्रयागराज में होली की अजीबो गरीब परंपरा है हथौड़े बारात की है। अनूठी परंपरा वाली इस शादी में दूल्हा होता है एक भारी-भरकम हथौड़ा, इसके बाद हथौड़े की बारात निकालने से पहले होता है कद्दू भंजन होता है।
सदियों चली आ रही है परंपरा
सदियों से चली आ रही इस परंपरा के मुताबिक़ हथौड़े और कद्दू का मिलन शहर के बीचो-बीच हजारों लोगों की मौजूदगी में कराया जाता है। इसका मकसद समाज मे फैली कुरीतियों को खत्म करना है और लोगों के मुताबिक इसी हथौड़े से कोरोना का भी इस बार पूरी तरह से अंत होगा। संगम नगरी में इसी के साथ रंगपर्व होली की शुरुआत भी हो जाती है। शहर की गलियों में जैसे दूल्हे राजा की भव्य बारात निकाली जाती है वैसे इस हथौड़े की बारात में सैकड़ों लोग ढोल नगाड़े के साथ इसमें शामिल होते हैं, डांस भी होता है। इस शादी में सैकड़ों बाराती भी शामिल हुए, जो रास्ते भर मस्ती में मगन होकर नाचते हुए हथौड़े की बारात में चलते रहे। इस हथौडा बारात में वही भव्यता देखने को मिली जो कि किसी शादी में देखने को मिलती है।
126 श्लोक में किया गया है दर्ज
हथौड़ा बारात के आयोजक संजय सिंह के मुताबिक़ इसकी उत्पत्ति संगम नगरी प्रयागराज में ही हुई और इसकी अपनी धार्मिक मान्यता भी है। संजय सिंह बताते हैं की भविष्यत्तर पुराण के 126वें श्लोक में वर्णन है की भगवान विष्णु प्रलय काल के बाद प्रयागराज में अक्षय वट की छइया पर बैठे थे, उन्होनें सृष्टि की फिर से रचना करने के लिए भगवान विश्वकर्मा से आह्वान किया। उस समय भगवान विश्वकर्मा के समझ में नहीं आया की क्या किया जाए, जिसके बाद भगवान विष्णु ने यहीं पर तपस्या, हवन और यज्ञ किया। जिसके बाद ही इस हथौडे़ की उत्पत्ति हुई। इसलिए संगम नगरी प्रयागराज को यह हथौड़ा प्यारा है। इसी के साथ संगम नगरी में आज से होली की भी शुरुआत हो जाती है।