- गोल्डमैन बोले नहीं मिल पा रही है फंडिंग -संस्था में कार्यरत सदस्यों के पास इतना पैसा नहीं है कि वो अपने कार्यालय का किराया पटा सके।
रायगढ़. पर्यावरण, सामाजिक हित व प्रदूषण जैसे गंभीर विषयों पर कार्य करने वाली संस्था जनचेतना का कार्यालय अब बंद होने के कगार पर है। ये संस्था उस समय सुर्खियों में आई जब इसके सदस्य को पर्यावरण के क्षेत्र में नोबेल कहे जाने वाले पुरस्कार गोल्डमैन अवार्ड दिया गया। वर्तमान में संस्था की माली हालत खराब होने की बात कही जा रही है जिसके कारण कार्यालय बंद करने की तैयारी है।
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मिली जानकारी के अनुसार संस्था का कार्यालय चक्रधरनगर चौक पर एक किराए के कमरे में चलता है। इस वक्त इस कार्यालय का किराया लगभग दो-सवा दो लाख रुपए हो गया है। संस्था में कार्यरत सदस्यों के पास इतना पैसा नहीं है कि वो अपने कार्यालय का किराया पटा सके। संस्था के सदस्य राजेश त्रिपाठी ने बताया कि कार्यालय के एक कमरे का किराया साढ़े चार हजार रुपए मासिक के दर से निर्धारित है जिसे लंबे समय से नहीं दिया जा सका है।
इस मामले में गोल्डमैन अवार्ड विनर रमेश अग्रवाल का कहना है कि संस्था की माली हालत खराब हो गई है, कहीं से कोई फंडिंग हो नहीं पा रही है। यदि कहीं से फंडिंग की स्थिति बनती भी है तो विचारधारा से समझौता करने की शर्त रखी जाती है इन हालात में इसे अस्वीकार करने के अलावा कोई और विकल्प हमारे पास नहीं होता है।
वहीं जब दूसरे सदस्य राजेश त्रिपाठी से बात की गई तो उन्होंने बताया कि संस्था की ओर हमेशा जनहित के मुद्दों को उठाया गया है। खासकर पर्यावरण, प्रदूषण, जमीन, रोजगार का मसला सर्वोपरी रहा है। इसका परिणाम भी सामने आया है, हमने राबो के खिलाफ आवाज उठाई उसमें हमारी जीत हुई, गारे पेलमा 4/6 कोल खदान का मामला उठाया हमारी जीत हुई, स्केनिया स्टील का मामला उठाया हमारी जीत हुई इसके अलावा 85 जनसुनवाई में हमने लोगों की, गरीबों की, आदिवासियों की आवाज उठाई इसका रिजल्ट यह है कि लगभग एक दर्जन उन प्रोजेक्ट पर इसका असर पड़ा है जो नियमों का उल्लंघन कर रहे थे।
कोयला सत्याग्रह ने मचाई खलबली
पूरे देश में पहली बार दो अक्टूबर 2012 को गारे गांव के किसानों ने हमारी जमीन हमारा कोयला का नारा बुलंद किया, इतना ही नहीं खुद से ग्रामीणों ने कोयला खोदकर नमक कानून की तर्ज पर कोयला कानून को तोड़ा। इस अभियान में जनचेतना मंच के राजेश त्रिपाठी और सविता रथ की काफी बड़ी भूमिका रही थी, देखते ही देखते ये आंदोलन देश के कई अन्य राज्यों में भी शुरू किया गया है। हर साल दो अक्टूबर को कोयला कानून तोड़ा जाता है और हमारी जमीन पर हमें कोयला खोदने का अधिकार दो का नारा बुलंद किया जाता है।
संस्था की माली हालत खराब है, किराया भी काफी ज्यादा हो गया है जिसे पटाने में काफी दिक्कत हो रही है इसके कारण कार्यालय बंद करने की नौबत आ गई है, लेकिन संस्था का कार्य चलता रहेगा, लोगों की आवाज उठाई जाती रहेगी- राजेश त्रिपाठी, जनचेतना मंच
कहीं से कोई फंडिंग नहीं हो रही है, जहां आसार बनते हैं वहां पर सिद्धांतों की बात सामने आ जाती है, ऐसे में हम समझौता करने की स्थिति में नहीं होते हैं। किराया लगभग दो से ढाई लाख हो गया है, जिसे पटाने में परेशानी है इसलिए बंद करने की नौबत आई है।
रमेश अग्रवाल, गोल्डमैन अवार्ड विनर