
रायपुर@राहुल जैन। Chhattisgarh Dilapidated Schools: छत्तीसगढ़ अपनी स्थापना की रजत जयंती मना रहा है, लेकिन राज्य की स्कूली शिक्षा व्यवस्था अभी भी पुरानी और जर्जर नींव पर खड़ी है। 16 जून से प्रदेश भर के स्कूलों में शाला प्रवेश उत्सव के साथ नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत होने जा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत सरकारी दावों पर भारी पड़ रही है। प्रदेश में आज भी लगभग 3789 स्कूल भवन जर्जर स्थिति में हैं, जो न केवल छात्रों की पढ़ाई में बाधा हैं, बल्कि मानसून के दौरान बड़ी दुर्घटनाओं को न्योता दे रहे हैं।
सरकार स्कूल शिक्षा विभाग पर अपने बजट का 13 प्रतिशत यानी 22360 करोड़ रुपए खर्च कर रही है, इसके बावजूद स्कूलों की हालत में सुधार न होना एक बड़ा प्रशासनिक प्रश्न है। पिछली सरकार के दौरान शुरू हुई मुख्यमंत्री स्कूल जतन योजना भ्रष्टाचार के आरोपों में उलझकर रह गई है। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक न होने और प्रशासनिक लेटलतीफी के कारण 5383 निर्माण कार्य आज भी ठंडे बस्ते में हैं।
अब देखना यह होगा कि शिक्षा विभाग केवल वैकल्पिक व्यवस्थाओं के दावों तक सीमित रहता है या जर्जर स्कूलों के पुनर्निर्माण के लिए युद्ध स्तर पर कोई ठोस पहल करता है। फिलहाल, हजारों बच्चों का भविष्य जर्जर दीवारों के नीचे और दुर्गम रास्तों पर सुरक्षित होने की प्रतीक्षा कर रहा है।
कई जिलों में हालात बेहद चुनौतीपूर्ण प्रदेश के कई जिलों में शिक्षा की स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण है। राजनांदगांव में 531 स्कूल जर्जर हैं, जिनमें से 107 भवन अति जर्जर श्रेणी में हैं। दुर्ग में 173 अति जर्जर और 31 भवनविहीन स्कूल हैं। बेमेतरा के ग्राम बैजी में एक ही परिसर में पांच कक्षाओं के बच्चे साथ पढ़ने को मजबूर हैं। भेलकी और मजगांव के छात्र दो साल से पंचायत भवनों में अपनी पढ़ाई कर रहे हैं।
सबसे दर्दनाक स्थिति वनांचल क्षेत्रों की है, जहां बच्चे केवल स्कूल भवन की समस्या से नहीं, बल्कि जान जोखिम में डालकर शिक्षा तक पहुंचने को मजबूर हैं। बालोद के कटरेल गांव में माध्यमिक शिक्षा के लिए बच्चों को रोज पांच किलोमीटर घने जंगल का रास्ता तय करना पड़ता है। कई जगहों पर शिक्षक स्वयं जान जोखिम में डालकर नाले पार कर स्कूल पहुंचते हैं।
इसी बीच, शिक्षा विभाग ने स्कूलों में राष्ट्रगान, राज्यगीत, भोजन मंत्र और महापुरुषों की जीवनी के वाचन जैसे सकारात्मक कदम उठाने के निर्देश दिए हैं, जिसका उद्देश्य बच्चों में भारतीय संस्कृति और नैतिक मूल्यों का संचार करना है। यह प्रयास सराहनीय है, परंतु शिक्षाविदों का मानना है कि जब तक बच्चों को बैठने के लिए एक सुरक्षित छत और स्कूल तक पहुंचने के लिए सुगम मार्ग नहीं मिलेगा, तब तक शैक्षिक गुणवत्ता के ये दावे अधूरे ही रहेंगे।
स्कूल शिक्षा सचिव डॉ. कमलप्रीत सिंह ने पिछले दिनों बैठक लेकर सभी जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) से कहा है कि वे जर्जर स्कूल में कक्षाएं संचालित नहीं करें। इसके यदि कोई दुर्घटना होती है, जो इसके लिए सीधे तौर पर डीईओ जिम्मेदार होंगे।