
Chhattisgarh Tender Controversy:छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग में 5,576 करोड़ रुपए की तीन महापरियोजनाओं के टेंडर में नियमों और प्रशासनिक मर्यादाओं की अनदेखी का मामला सामने आया है। पदोन्नति, पदस्थापना और ई-ऑफिस से निकले अधिकृत दस्तावेजों की पड़ताल से खुलासा हुआ है कि चहेती कंपनियों को उपकृत करने के लिए न केवल शासन के आदेश दरकिनार किए गए, बल्कि जो अधिकारी मंत्रालय से हट चुके थे, उन्होंने 7 हफ्ते बाद भी पुरानी मुहर लगाकर अरबों के टेंडर दस्तावेज मंजूर कर दिए।
वहीं, इस पूरी प्रक्रिया में आपत्ति जताने वाले दो संविदा अफसरों एवं मंत्रालय पदस्थ एक नियमित अफसर को हटाया गया। पूर्व विधायक गुलाब कमरो ने इस मामले में प्रधानमंत्री कार्यालय, मुख्य सचिव और ईओडब्ल्यू को पत्र लिखकर 14 नामजद अफसरों पर कार्रवाई व टेंडर निरस्त करने की मांग की है। पूरा खेल सिकासार-कोडार लिंक कैनाल (2,549.86 करोड़), मटनार-देवरगांव बैराज (1,636.69 करोड़) और मोहमेला-सिरपुर बैराज ( 574.73 करोड़) की निविदाओं में रचा गया।
शासन के नियमानुसार प्री-क्वालिफिकेशन (पात्रता जांच) समिति की अध्यक्षता मुख्य अभियंता (प्रबोधन) शासन से स्वीकृत आदेश अनुसार को करनी थी, लेकिन प्रमुख अभियंता जितेन्द्र नेताम ने शासन से अनुमति लिए बिना मुख्य अभियंता (प्रबोधन) को अध्यक्ष पद से हटाकर खुद को समिति अध्यक्ष बना लिया। यानी प्रशासनिक व्यवस्था में 'निर्णय-स्तरों के पृथक्करण' का सिद्धांत तोड़ते हुए वे खुद ही अनुशंसा करने वाले बने और खुद ही उसे पास करने वाले बन बैठे।
दस्तावेजों के मुताबिक, 12 मार्च 2026 को मक्सी कुजूर मुख्य अभियंता पदोन्नत हुए। 6 अप्रैल 2026 को उन्हें मंत्रालय में विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी (ओएसडी) के पद से मुक्त कर मुख्य अभियंता (महानदी परियोजना, रायपुर) पदस्थ किया गया। सेवा नियमों के तहत नई कुर्सी संभालते ही पुराने पद के अधिकार और मुहर का उपयोग स्वतः समाप्त हो जाता है। इसके बावजूद 25 मई 2026 को यानी मंत्रालय से हटने के करीब 49 दिन बाद ई-ऑफिस से जारी तीनों परियोजनाओं के टेंडर व फॉर्म-एफ दस्तावेजों पर ‘अप्रूव्ड’ लिखकर ‘विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी, मंत्रालय’ की मुहर लगाई गई। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर चहेती कंपनियों के वित्तीय टर्नओवर और तकनीकी अनुभव की शर्तें तय कर उन्हें पात्र बनाया गया।
जुलाई 2026 में कुजूर का तबादला 'मुख्य अभियंता, महानदी गोदावरी कछार' के पद पर कर दिया गया। यह वही कार्यालय है, जहां से सिकासार–कोडार परियोजना की दरें खोलने के कमेटी के सदस्य मुख्य अभियंता कुजूर हैं । यानी जिस अफसर ने मंत्रालय की पुरानी मुहर से निविदा प्रपत्र मंजूर किए, उसी ने फील्ड में बैठकर टेंडर खुलावाया , अपात्र कंपनियों को पात्र ठहराया और दरें भी खुलवायी । आरोप है कि मटनार में एनसीसी लिमिटेड व ऋत्विक प्रोजेक्ट्स, मोहमेला में ओम मेटल्स समेत अन्य को वर्क-इन-हैंड छिपाने और अनुभव की शर्तें पूरी न करने के बावजूद उपकृत किया गया।
इस गड़बड़ी का विरोध करने की कीमत कुछ अफसरों को चुकानी पड़ी। संविदा अधिकारी गुरुवर ने अपात्र फर्मों को पात्र करने का विरोध किया, तो दबाव ऐसा बना कि उन्हें एक माह का वेतन जेब से भरकर इस्तीफा देना पड़ा। वहीं दूसरे संविदा अधिकारी भागवत को टेंडर से ठीक पहले हटाया गया और महज एक हफ्ते के भीतर बिना किसी नोटिस के उनकी सेवा समाप्त कर दी गई। तीसरी गाज कार्यपालन अभियंता शिवराम सिधारे पर गिरी, स्वीकृत निविदा दस्तावेज में नियमों को परिवर्तन करने पर विरोध किया गया तो इन्हें हटाकर प्रमुख्य अभियंता कार्यालय अटैच कर दिया गया
राजेश सुकुमार टोप्पो, सचिव, जल संसाधन विभाग के मुताबिक, निविदा प्रक्रिया की कार्यवाही नियमानुसार किया गया है। जिसे माननीय उच्च न्यायालय ने भी मान्य किया है।