गोलबाजार, मालवीय रोड, बंजारी रोड बाजार, एमजी रोड में चुनाव पर चर्चा करने जब 'पत्रिका' पहुंचा तो इस तरह छलका कारोबारियों का दर्द
अजय रघुवंशी/रायपुर. ये रायपुर का बाजार है, जरा संभलकर, बड़े खरीदार भी यहां लुटने को तैयार हैं। ऐसा कौन सा नगीना है, जो यहां नहीं मिलता। यहां जात-पात की लड़ाई नहीं, बल्कि ग्राहक और व्यापार ही सबसे बड़ा मजहब है। शहर का ऐसा कौन का शख्स है, जो इन इन बाजारों की गलियों से नहीं गुजरा। यहां दिवाली की रौनक है तो ईद की मोहब्बत भी। यहां भीड़ में धक्के खाना बुरा नहीं लगता, बुरा नहीं लगता जब सदर बाजार में रंग-गुलालों हमारे चेहरे रंगते हैं।
गोलबाजार, मालवीय रोड, सदर बाजार, एमजी रोड, जवाहर नगर बाजार इन बाजारों की यादें हमारे दादा-परदादादाओं से जुड़ी है, लेकिन कौन है, जो इन बाजारों की खुशियां छिनना चाहता है। कौन है जिसने छीन ली है कारोबारियों की नींद।
गुलामी के दौर की ये बाजारें आजादी के बाद एक बार फिर बिकने की कगार पर है। चुनाव पर चर्चा करने जब हम बाजार पहुंचे तो कारोबारियों का दर्द झलका। सबसे पहले गोलबाजार पहुंचे तो दुकानदार कहता है कि मैं तो खुद बिकने को आया हूं बाजार में...।
पहले ग्राहकों से फुर्सत नहीं थी, अब खाली बैठे हैं
गोलबाजार में 95 साल के बुजुर्ग कारोबारी सैजूमल आहूजा की उम्र घर में आराम करने की है, लेकिन वे रोज सुबह दुकान पहुंच जाते हैं। वे कहते हैं कि जब व्यापार को ही फायदा नहीं तो क्या चुनाव, क्या वोटिंग। वो दौर और था ये दौर और है। ऑनलाइन और मल्टीस्टोर्स मार्केट के जमाने में शटर खोलने के बाद यह तय नहीं है कि आज कितनी ग्राहकी आएगी, ज्यादा नहीं आज से 10 साल पहले काम से बात करने की फु रसत नहीं रहती थी और अब ग्राहकों का इंतजार करना पड़़ता है। वह दिन दूर नहीं जब परंपराओं को समेटे ये बाजार मल्टीस्टोर कंपनियों के चमकदार फर्श के नीचे दफन हो जाएगी।
पार्किंग तक नहीं बना सके
चूडिय़ां बेचने वाली जुबेदा बेगम को शिकायत है उन मौकापरस्तों से है जो सिर्फ चुनाव में शक्ल दिखाते हैं। हमारे सवाल पर उन्होंने हाथ जोड़ लिया कहा- भैया किसी की जीत-हार से मतलब नहीं है। मैं तो बाजार में सुविधाओं की बात करती हूं, जो काम इतने बरसों में नहीं हो सका अब किसकी उम्मीद करें। जुबेदा के साथ चूड़ी बेचने वाली ताहिरा बेगम ने कहा- अब वह ग्राहकी कहां जो पहले हुआ करती था। चुनाव में वोट दे भी तो किसे, कौन यहां हमे पूछने आता है।
नुकसान बहुत, दिखता नहीं है सच
मालवीय रोड के चमकदार शो-रूम में बैठने वाले मोबाइल कारोबारी राजेश वासवानी कहते हैं कि आजकल व्यापार में नुकसान बहुत है, लेकिन इसका सच लोगों को नहीं दिखता। 5 साल में सरकार ने व्यापारियों के हित में कई काम किए, लेकिन भारतीय जनता पार्टी की केंद्र की सरकार ने दो नीतियां लाई। पहला नोटबंदी और दूसरा जीएसटी। जीएसटी का हम स्वागत हैं, लेकिन नोटबंदी का निर्णय बैंकों की लापरवाही के कारण विफल हो गया। उसका असर आज तक व्यापारियों का झेलना पड़ रहा है। ई-कॉमर्स पॉलिसी पर सरकारें खामोश है। ऑनलाइन मार्केट में कैश का कोई हिसाब-किताब नहीं है, हजारों करोड़ टैक्स का नुकसान आखिर क्यों। रिटेल में एफडीआइ पर विरोध करने वाली सरकार ने आखिरकार इस सेक्टर में विदेश निवेश के लिए बाहें फैला दी है। वह दिन दूर नहीं जब हम विदेशी कंपनियों के आर्थिक गुलाम हो जाएंगे।
वो करोड़ों लूटे तो कुछ नहीं, हम गाड़ी खड़ी करें तो चालान
पार्किंग की समस्या को जायज बताने वाले श्री बंजारी रोड बाजार के कारोबारी लालचंद गुलवानी कहते हैं कि वे करोड़ों लूटकर चले गए तो कुछ नहीं हम सड़क पर गाड़ी खड़ी करें तो नियमों का उल्लंघन। चुनाव के सवाल पर उन्होंने कहा कि वोट उसी को जो दे सभी को। चुनाव के समय हाथ जोड़कर आने वाले और बाद में भूलने वालों को अब नमस्ते करूंगा, जो काम करेगा वोट उसी को वोट दूंगा।
प्रमुख बाजारों की नीतिगत समस्याएं
1. शहर के भीतर सरकारी जगह पर कामर्शियल कॉम्पलेक्स के स्थान पर पार्किंग के लिए जगह
2. जीएसटी लागू होने के बाद अन्य राज्य स्तर के टैक्स का समायोजन।
3. हर जिले में शहर से बाहर डूमरतराई थोक बाजार की तर्ज पर होलसेल मार्केट।
4. प्रदेश में व्यापार कल्याण बोर्ड का गठन किया।
5. ग्राहकों की सुविधाओं के लिए ठोस पहल।
व्यापारियों ने इस बात पर जताई नाराजगी
1.बाजार में मूलभूत सुविधाओं पर ध्यान नहीं देना।
2.जीएसटी का बेपटरी होना।
3. नोटबंदी के बाद बाजार पर बुरा प्रभाव।
4. बैंकों की राशि लेकर भागने वालों पर कार्यवाही नहीं होना।
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