
रायपुर @संतराम साहू।Chhattisgarh School Dropout: शिक्षा के अधिकार और विभिन्न योजनाओं के बावजूद छत्तीसगढ़ में स्कूली शिक्षा के दौरान बच्चों के पढ़ाई छोड़ने (ड्रॉपआउट) की समस्या पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई है। खासकर प्राथमिक से माध्यमिक और माध्यमिक से हाईस्कूल स्तर पर बड़ी संख्या में विद्यार्थी स्कूल छोड़ रहे हैं। यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन के नए आंकड़े बताते हैं कि कक्षा बढ़ने के साथ ड्रॉपआउट दर भी बढ़ती है। इसे गंभीर मसला मानते हुए पिछले दिनों स्कूल शिक्षा विभाग ने नई रणनीति बनाकर ड्रॉपआउट का प्रतिशत शून्य पर लाने का फैसला लिया है।
बताया जाता है कि पिछले दिनों मुख्य सचिव विकासशील ने स्कूल शिक्षा की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने सचिव से लेकर संचालक और अन्य अधिकारियों को स्कूलों में बच्चों के ड्रॉपआउट को लेकर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि जिन जिलों में ड्रॉपआउट का प्रतिशत कम है, उसे शून्य पर लाने के लिए काम किया जाए।
स्तर -अनुमानित ड्रॉपआउट दर
कक्षा 1 से 5 (प्राथमिक) - 1 से 2 प्रतिशत
कक्षा 1 से 8 (एलीमेंट्री) - 4 से 5 प्रतिशत
कक्षा 9-10 (माध्यमिक) - 18 से 22 प्रतिशत
राज्य में सबसे बड़ी चुनौती कक्षा 8 के बाद विद्यार्थियों को स्कूल में बनाए रखना है। आर्थिक कारण, दूरस्थ विद्यालय, पारिवारिक जिम्मेदारियां, बाल विवाह और मजदूरी जैसी वजहें ड्रॉपआउट के प्रमुख कारण मानी जा रही हैं।
शिक्षा विभाग की जिला स्तरीय समीक्षा और पिछले वर्षों के यूडीआईएसई आंकड़ों के आधार पर आदिवासी एवं दूरस्थ जिलों में ड्रॉपआउट दर अपेक्षाकृत अधिक पाई गई है। इनमें प्रमुख जिले बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर, दंतेवाड़ा, कोंडागांव, बलरामपुर में माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर राज्य औसत से काफी अधिक दर्ज की गई है। इसकी प्रमुख वजह दूरस्थ बस्तियां, परिवहन सुविधा का अभाव और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियां हैं।
जानकारी के अनुसार, राज्य में 55 लाख से अधिक विद्यार्थी स्कूल शिक्षा व्यवस्था से जुड़े हुए हैं। इनमें सरकारी स्कूलों का हिस्सा सबसे अधिक है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कक्षा 8 से 10 के बीच विद्यार्थियों को रोकने के लिए विशेष अभियान नहीं चलाया गया तो बोर्ड कक्षाओं में नामांकन और परिणाम दोनों प्रभावित हो सकते हैं। विशेष रूप से बस्तर और सरगुजा संभाग के जिलों पर अतिरिक्त फोकस की जरूरत बताई जा रही है।