
Chhattisgarh Dussehra: विजयादशमी पर देशभर में रावण के पुतले दहन की परंपरा है, लेकिन बालोद जिले में दशहरे का एक बेहद अलग और अनोखा रंग देखने को मिलता है। जिले के तीन गांवों में वर्षों से चली आ रही अनूठी परंपराएं न केवल कौतूहल का विषय हैं, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि की मिसाल भी हैं। जल में दहन (ग्राम सिरसिदा): यहां वर्ष 1994 (33 साल) से तालाब के पानी के बीच (तैरते) रावण का दहन किया जाता है। ग्रामीणों ने ट्रैक्टर-साइकिल ट्यूब के प्रयोग से पानी में पुतला खड़ा करने की अनूठी तकनीक खोजी थी। इस बार आतिशबाजी के साथ 25 फीट के रावण का जल-दहन होगा।
गुरुर विकासखंड के तार्री गांव में 70 वर्षों से रावण दहन नहीं किया जाता। यहां रावण को प्रकांड विद्वान मानकर उनकी प्रतिमा की विधिवत पूजा की जाती है। खास बात यह है कि रावण प्रतिमा के ठीक सामने राम-जानकी मंदिर भी स्थापित है। 7 अग्निबाण से वध (ग्राम नेवारीकला): वर्ष 1947 से यहां रावण की कंक्रीट की स्थायी प्रतिमा स्थापित है। रामलीला के बाद श्रीराम का पात्र 7 अग्निबाण चलाकर पानी से भरा मटका फोड़ता है, जो मानव मन की 7 बुराइयों पर विजय का प्रतीक है। कैसे पहुंचे: बालोद जिला मुख्यालय से तीनों गांव सड़क मार्ग द्वारा आसानी से जुड़े हुए हैं।
विजयादशमी की शाम 6:00 बजे के बाद रामलीला और मुख्य रस्मों की शुरुआत होती है। यदि आप भीड़भाड़ से बचकर अनोखी परंपराओं का आनंद लेना चाहते हैं, तो शाम 5:00 बजे तक पहुंचना उचित रहेगा।
दशहरे पर 30% तक महंगे हुए रावण के पुतले
महंगाई की मार: भिलाई से रायपुर तक बढ़ी कारीगरों की मुश्किलें
रायपुर-भिलाई. विजयादशमी मंगलवार को पूरे प्रदेश में धूमधाम से मनाई जाएगी, बाजारों में रावण के पुतलों की रौनक तो छा गई है, लेकिन इस बार महंगाई का ग्रहण पुतलों की चमक पर भी पड़ गया है। रायपुर समेम प्रदेश अन्य बांस, कपड़ा, बोरी, रस्सी और रंग-रोगन के दामों में बेतहाशा बढ़ोतरी और कारीगरों की बढ़ी हुई मजदूरी के कारण इस साल रावण के पुतले बनाने की लागत 30 से 35 प्रतिशत तक महंगी हो गई है। भिलाई के कुथरेल में स्थिति यह है कि 15 से 45 फीट ऊंचे रावण 1500 से 2000 रुपए प्रति फीट तक बिक रहे हैं। पिछले साल जो 20 फीट का पुतला 16 से 20 हजार रुपए में तैयार होता था, उसकी कीमत अब 27 हजार रुपए तक पहुंच गई है। वहीं बेमेतरा में रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के तीनों पुतलों की कुल लागत अब एक लाख रुपए को पार कर गई है।
जशपुर में दशहरे के दो परस्पर विरोधी और अनूठे रंग देखने को मिलते हैं। एक तरफ 27 पीढ़ियों पुरानी रियासतकालीन परंपरा के तहत शाही सवारी, शस्त्र पूजा और 55 फीट ऊंचे रावण का दहन होता है, जिसके लिए सरकार 5 लाख का अनुदान देती है। वहीं, दूसरी ओर मनोरा के पहाड़ी इलाकों में रहने वाली असुर जनजाति महिषासुर को अपना पूर्वज मानती है और नवरात्रि को शोक व पूर्वजों के स्मरण के रूप में मनाती है। यह सांस्कृतिक विविधता जशपुर के इतिहास और लोकस्मृतियों के दो अलग पहलुओं को उजागर करती है।