
बालोद में अनोखी रामलीला (Photo Patrika)
Chhattisgarh News: आमतौर पर रामलीला के मंच पर भगवान राम, माता सीता, रावण और दूसरे पात्रों की भूमिका पुरुष निभाते नजर आते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के बालोद जिले के ग्राम चारवाही में बेटियों ने इस परंपरा को एक नई पहचान दी है। यहां रामलीला का मंचन पुरुष नहीं, बल्कि गांव की बेटियां करती हैं। खास बात यह है कि भगवान राम से लेकर रावण तक सभी 20 पात्रों की भूमिका बालिकाएं ही निभाती हैं। दमदार आवाज, शानदार अभिनय और संवाद अदायगी से ये बेटियां दर्शकों का दिल जीत रही हैं।
गांव की बेटियों की यह पहल केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनी परंपरा को बचाने की एक प्रेरक मिसाल भी है। तीन साल पहले जब पात्रों की कमी के कारण रामलीला बंद होने की नौबत आ गई थी, तब गांव की बेटियों ने आगे आकर इसकी जिम्मेदारी संभाली। उन्होंने साफ कहा कि वे रामलीला की परंपरा को टूटने नहीं देंगी। इसके बाद बेटियों ने मंचन शुरू किया और आज वे लगातार इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं।
ग्राम चारवाही में वर्षों से रामलीला के आयोजन की परंपरा चली आ रही है। गांव के लोग हर साल इस आयोजन का इंतजार करते हैं। रामलीला के माध्यम से भगवान राम के जीवन, आदर्शों और रावण पर विजय की कथा का मंचन किया जाता है। लेकिन तीन साल पहले कलाकारों की कमी के कारण इस परंपरा पर संकट खड़ा हो गया था। पात्र नहीं मिलने के कारण रामलीला का मंचन बंद होने की स्थिति बन गई थी। ऐसे समय में गांव की बेटियां आगे आईं। उन्होंने रामलीला बंद होने देने के बजाय खुद ही सभी पात्र निभाने का निर्णय लिया। बेटियों की पहल के बाद फिर से मंचन शुरू हुआ। धीरे-धीरे उन्होंने अलग-अलग किरदारों के संवाद, अभिनय और मंच संचालन की तैयारी की। अब यही बेटियां राम, सीता, रावण सहित रामलीला के सभी 20 पात्रों को जीवंत करती हैं।
चारवाही की रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता इसकी पूरी बालिका मंडली है। यहां भगवान राम की भूमिका भी एक बालिका निभाती है और रावण का किरदार भी गांव की बेटी ही करती है। अन्य सभी पात्रों की भूमिका भी बालिकाएं निभाती हैं। अलग-अलग किरदारों के मुताबिक आवाज में बदलाव, संवाद बोलने का अंदाज और हाव-भाव दर्शकों को आकर्षित करते हैं। मंच पर बेटियों का आत्मविश्वास और अभिनय देखकर लोग रामलीला देखने के लिए पहुंचते हैं। पुरुष कलाकारों के बिना पूरे मंचन को संभालना अपने आप में खास है। इसके लिए बालिकाओं को संवाद याद करने से लेकर पात्रों के अनुरूप अभिनय करने तक मेहनत करनी पड़ती है।
गांव की बेटियों ने यह साबित किया है कि किसी परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए इच्छाशक्ति और सामूहिक प्रयास सबसे महत्वपूर्ण हैं। जब कलाकारों की कमी के कारण रामलीला बंद होने की स्थिति बनी, तब उन्होंने जिम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय आगे बढ़कर इसे संभाला। उनकी इस पहल से गांव की सांस्कृतिक परंपरा भी जारी है और बालिकाओं को अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर भी मिल रहा है। रामलीला जैसे पारंपरिक मंच पर बेटियों की भागीदारी सामाजिक बदलाव का संदेश भी देती है। यह पहल बताती है कि संस्कृति और परंपरा को सहेजने में बेटियां भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
बालिका रामलीला मंडली के संचालनकर्ता सूबे लाल साहू और सदस्य मनीष कुमार के अनुसार, ग्राम चारवाही में लंबे समय से रामलीला का आयोजन होता रहा है। तीन साल पहले पात्रों की कमी के कारण आयोजन बंद होने की नौबत आई थी। उस समय गांव की बेटियों ने इसे जारी रखने का संकल्प लिया और मंचन की जिम्मेदारी अपने हाथों में ले ली। इसके बाद से बालिकाएं लगातार रामलीला का मंचन कर रही हैं। गांव की बेटियों की इस पहल ने वर्षों पुरानी परंपरा को नया जीवन दिया है। चारवाही की यह रामलीला अब इस बात की मिसाल है कि जब परंपरा को बचाने का संकल्प लिया जाए, तो बेटियां भी उसकी मजबूत आधार बन सकती हैं।
Updated on:
19 Oct 2026 07:19 pm
Published on:
19 Oct 2026 07:19 pm
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