रायपुर

480 साल पहले लिखी गई पद्मावत में मौजूद हैं छत्तीसगढ़ी बोली के रंग

बहुत कम लोगों को पता होगा कि 480 साल पहले लिखे गए इस महाकाव्य में छत्तीसगढ़ी बोली के ऐतिहासिक सूत्र मौजूद है।
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Updated: 27 Jan 2018, 11:12 AM IST
Padmaavat

आवेश तिवारी/रायपुर. देश के कोने कोने में भले सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी की सुप्रसिद्ध कृति पद्मावत पर बनी फिल्म को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हों। लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि 480 साल पहले लिखे गए इस महाकाव्य में छत्तीसगढ़ी बोली के ऐतिहासिक सूत्र मौजूद है।

1978 में प्रकाशित अविभाजित मध्य प्रदेश के बिलासपुर गजेटियर में इस बात का विशेष तौर पर उल्लेख करते हुए कहा गया है कि मलिक मोहम्मद जायसी के पद्मावत में छत्तीसगढ़ी बोली के शब्द बहुतायत मौजूद है। केवल इतना ही नहीं जायसी ने कई खण्डों के नाम ऐसे रखे हैं जो आम तौर पर छत्तीसगढ़ी बोली में इस्तेमाल होते हैं जैसे कि पद्मावत के तीसरे खंड का नाम सुआ खंड है। सभी जानते हैं कि सुआ छत्तीसगढ़ की प्रसिद्ध नृत्य शैली है।

जार्ज गियर्सन और हीरालाल की मेहनत
पद्मावत में छत्तीसगढ़ी बोली के इस्तेमाल का सबसे पहले खुलासा 20 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंग्रेज भाषा विज्ञानी जार्ज गियर्सन ने किया था। दरअसल जार्ज देश भर की बोलियों और भाषाओं के अध्ययन के क्रम में छत्तीसगढ़ आये थे। यहाँ उन्होंने धमतरी के काव्योपाध्याय हीरालाल द्वारा छत्तीसगढ़ी बोली को लेकर किये गए काम को देखा उन्होंने स्वीकार किया कि हीरालाल का काम पूरी तरह से वैज्ञानिक है इसलिए छत्तीसगढ़ी बोली के व्याकरण के अलग से प्रकाशन की जरुरत नहीं है।

जार्ज गियर्सन ने लिखा कि जिस किस्म के वाक्य या शब्द छत्तीसगढ़ की बोली में है वैसे ही शब्द पद्मावत में मिलते हैं। गियर्सन की यह खोज रायल एशियाटिक सोसायटी ने प्रकाशित भी की भाषा वैज्ञानिक मानते हैं कि पद्मावत की भाषा पूरब की हिंदी है।महत्वपूर्ण है कि पूरब की हिंदी मुख्य रूप से तीन भाषाओं में बोली जाती रही है जिनमे अवधी, बघेलखंडी और छत्तीसगढ़ी है।

पद्मावत में इस्तेमाल हुए छत्तीसगढ़ी शब्द
- जायसी के पद्मावत की रत्नेसेन -शूली खंड की कुछ पंक्तियाँ नीचे हैं, जिनसे
- पता चलता है कि जायसी ने छत्तीसगढ़ी बोली का इस्तेमाल कैसे किया -
- राजकुँवर यह, होहि न जोगी। सुनि पदमावति भएउ बियोगी॥
- जंबूदीप राजघर बेटा। जो है लिखा सो जाइ न मेटा॥
- तुम्हरहि सुआ जाइ ओहि आना। औ जेहि कर, बर कै तेइ माना॥
- पुनि यह बात सुनी सिव-लोका। करसि बियाह धरम है तोका॥

इनमें से जोगी, मेटा, बियाह, धरम, सुआ, औ जैसे शब्द छत्तीसगढ़ी बोली में बेहद प्रचलित शब्द हैं। इसी तरह से मोर, थोर, के, हो, तोका, होई जैसे छत्तीसगढ़ी बोली के शब्दों का भी पद्मावत में जमकर इस्तेमाल हुआ है।

छत्तीसगढ़ी बोली के जानकार और वरिष्ठ पुरातत्वविद राहुल सिंह ने कहा कि दंतेश्वरी मंदिर, दंतेवाड़ा, में मिला 23 पंक्तियों का शिलालेख छत्तीसगढ़ी का पहला अभिलिखित नमूना माना जाता है। लेख की भाषा को विद्वान अध्येताओं द्वारा हिन्दी कहीं ब्रज और भोजपुरी प्रभाव युक्त, छत्तीसगढ़ी मिश्रित हिन्दी तो कहीं बस्तरी भी कहा गया है। यह मानना स्वाभाविक लगता है कि छत्तीसगढ़ में भी अवधी का प्रभाव पद्मावत और रामचरितमानस से आया है।

रायपुर वरिष्ठ पुरातत्ववेत्ता जी एल रायकवार ने कहा कि बोलियाँ यात्राएं करती हैं निस्संदेह जायसी की बोली छत्तीसगढ़ तक पहुंची है। यह बात भाषा और पद्मावत को लेकर जन सामान्य की अभिरुचि के बारे में बताता है।

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27 Jan 2018, 11:12 AM IST
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