
Chhattisgarh News: रायपुर स्थित स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट की जमीन को लेकर एक अनोखा और बड़ा कानूनी विवाद सामने आया है। रायपुर के किसान अश्विनी बांधे ने एयरपोर्ट की 34.35 हेक्टेयर (लगभग 816 एकड़ के एक बड़े हिस्से) जमीन पर अपना पुश्तैनी दावा ठोकते हुए देश की सर्वोच्च अदालत का दरवाजा खटखटाया है। एक तरफ जहां रायपुर में किसान अपनी पुश्तैनी जमीन के लिए ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई लड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर भिलाई स्टील प्लांट और कोरबा की कोयला खदानों (एसईसीएल) के लिए जमीन देने वाले भूविस्थापित परिवार दशकों बाद भी रोजगार और उचित पुनर्वास के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
किसान का दावा है कि एयरपोर्ट की वर्तमान टर्मिनल बिल्डिंग और गार्डन उनके पूर्वजों की जमीन पर बने हैं, जिसका जून 2026 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर 3500 करोड़ रुपए का मुआवजा मांगा गया है। किसान पिछले 35 सालों से रेकॉर्ड रूम, दफ्तरों और अदालतों के चक्कर काट रहे हैं, जिसमें उनके अब तक करीब 20 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं।
इस लड़ाई को तब बड़ी मजबूती मिली जब संस्कृति विभाग रायपुर की एक ऐतिहासिक प्रदर्शनी में उन्हें अपनी जमीन के सरकारी दस्तावेज मिले। संस्कृति विभाग के उपसंचालक डॉ. प्रताप पारेख ने भी पुष्टि की है कि द्वितीय विश्व युद्ध के समय माना एयरफील्ड के लिए बरौदा, रामचंडी और आसपास के गांवों की जमीन अधिग्रहित की गई थी, जिसके राजस्व रेकॉर्ड आज भी सुरक्षित हैं। किसान ने लोक सेवा गारंटी अधिनियम के तहत इन प्रमाणित प्रतियों को निकालकर सुप्रीम कोर्ट में अपना दावा मजबूत किया है।
Raipur Airport Land: मामले के ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, ब्रिटिश सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1939 में डिफेंस ऑफ इंडिया एक्ट लागू किया था। इसी के तहत 1942 में हवाई जहाजों को उतारने और सैन्य ठिकाने (माना एयरफील्ड) बनाने के लिए देश भर में जमीनें अधिग्रहित की गई थीं। किसान अश्विनी बांधे का कहना है कि उनके पूर्वजों से यह जमीन महज 1300 रुपए सालाना के अस्थाई किराए (लीज) पर ली गई थी। शर्त के मुताबिक युद्ध खत्म होने के बाद यह जमीन लौटाई जानी थी, लेकिन 84 साल बीत जाने के बाद भी न तो जमीन वापस मिली और न ही किराया।
भिलाई इस्पात संयंत्र (बीएसपी) की बुनियाद जिन किसानों की जमीनों पर रखी गई, आज उनके बच्चे अपने ही खेतों पर बने प्लांट में दिहाड़ी मजदूरी करने को मजबूर हैं। 1990 के बाद से प्रबंधन ने भूविस्थापितों के परिवारों को नौकरी देना बंद कर दिया।मोरिद निवासी मंगतू (0.69 एकड़ जमीन, 2822 रुपए मुआवजा), कार्तिक राम निषाद (3.73 एकड़ जमीन, 12,981 रुपए मुआवजा) और चार भाई (कार्तिक, राम सहाय, अलखराम, गेंदराम - 4.42 एकड़ जमीन, 17,787 रुपए मुआवजा) जैसे सैकड़ों किसानों के परिवारों को मुआवजा तो मिला, लेकिन नौकरी नहीं मिली। जिन किसानों के बच्चे कभी जमीन के मालिक होने वाले थे, वे आज ठेकेदारों के पास महज 7 से 8 हजार रुपए महीने की दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं।
देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले में एसईसीएल की कोयला खदानों (गेवरा, दीपका, कुसमुंडा) के लिए अपनी जमीनें देने वाले भूविस्थापित किसान पिछले चार दशकों से पुनर्वास और रोजगार के लिए दफ्तरों और आंदोलनों के चक्कर काट रहे हैं। कोसमंदा के शंकर कंवर (जमीन अधिग्रहण 1982), बेलटिकरी के विजय कुमार कंवर (अधिग्रहण 1985) और जरहाजेल के फिरतलाल यादव (अधिग्रहण 1983) जैसे कई पात्र लोग आज भी नौकरी की आस में बूढ़े हो रहे हैं। छत्तीसगढ़ किसान सभा के संयुक्त सचिव प्रशांत झा के मुताबिक, एसईसीएल प्रबंधन अक्सर छोटी-मोटी दस्तावेजी कमियों का बहाना बनाकर पात्र भूविस्थापितों को रोजगार से वंचित रख रहा है। प्रभावितों को प्राथमिकता के आधार पर रोजगार मिलना चाहिए, लेकिन न्याय न मिलने के कारण किसान बार-बार उग्र आंदोलन के लिए मजबूर हैं।