
Chhattisgarh Waste Management: प्रदेश में अब बड़े पैमाने पर कचरा पैदा करने वाले (बल्क वेस्ट जनरेटर) संस्थानों पर शासन-प्रशासन की जियो-टैगिंग के जरिए डिजिटल नजर रहेगी। होटल, मॉल, अस्पताल, बस स्टैंड, बड़ी आवासीय कॉलोनियां और सरकारी कार्यालय अब कचरा छिपा नहीं सकेंगे। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के निर्देश के बाद राज्य के नगरीय निकाय ऐसे सभी संस्थानों की जियो-टैगिंग करने की तैयारी में जुट गए हैं, ताकि प्रतिदिन 100 किलो या उससे अधिक ठोस कचरा पैदा करने वाले किसी भी संस्थान को नियमों के दायरे से बाहर न रहने दिया जाए। ठोस अपशिष्ट प्रबंधन की ऑनलाइन मॉनिटरिंग के लिए एक विशेष डिजिटल सिस्टम विकसित किया जा रहा है।
प्रदेश में करीब 1.15 लाख निजी व शासकीय संस्थानों, व्यावसायिक प्रतिष्ठानों तथा बड़ी आवासीय सोसायटियों के इस व्यवस्था के दायरे में आने का अनुमान है। नगरीय प्रशासन विभाग ने इसके लिए सर्वे शुरू करते हुए वार्ड-वार सूची तैयार करने की जिम्मेदारी अधिकारियों-कर्मचारियों को सौंप दी है। नए नियमों के मुताबिक अब किसी भी आवासीय परियोजना, बाजार, अस्पताल, स्कूल या सरकारी-गैर सरकारी प्रोजेक्ट को मंजूरी तभी मिलेगी, जब वे अपनी साइट पर बल्क वेस्ट जनरेटर के नियमों के तहत कचरा प्रबंधन के लिए जगह आरक्षित करेंगे। यह जगह तय होने के बाद ही पर्यावरण एनओसी और प्रोजेक्ट सर्टिफिकेट जारी होगा। नियमों के उल्लंघन पर भारी जुर्माने का प्रावधान है।
कचरे की मात्रा: जिन संस्थानों से रोजाना 100 किलो या इससे अधिक कचरा निकलता है।
भूखंड का दायरा: 20 हजार वर्गमीटर या इससे अधिक एरिया वाले भूखंड।
आवासीय सोसायटियां: 200 से अधिक आवास और 5000 वर्गमीटर भूखंड वाले परिसर।
पानी की खपत: जहां रोजाना 40 हजार लीटर से अधिक पानी की खपत होती है।
यहां कराना है पंजीयन: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ईपीआर (एक्सेन्डेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी) पोर्टल पर।
बड़े होटल और रिसॉर्ट, अस्पताल, शॉपिंग मॉल, विश्वविद्यालय एवं कॉलेज, बड़े सरकारी कार्यालय, बड़े आवासीय अपार्टमेंट/सोसायटी, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, बस स्टैंड, स्टेडियम, खेल परिसर, बड़ी मंडियां और विवाह/इवेंट स्थल।
फल, सब्जी, मटन, मुर्गी और मछली बाजारों से निकलने वाले अपशिष्ट के निपटारे के लिए बाजार के पास 'बायोमिथिनेशन संयंत्र' (कचरे से गैस बनाने का प्लांट) की स्थापना को बढ़ावा दिया जाएगा। पार्कों और उद्योगों से निकलने वाले कचरे की प्रोसेसिंग और खाद बनाने का काम परिसर के भीतर ही करना होगा। यदि किसी संस्थान से प्रतिदिन निकलने वाला कचरा 5 टन से अधिक है, तो उन्हें राज्य व क्षेत्रीय पर्यावरण संरक्षण मंडल कार्यालय में विशेष आवेदन करना होगा।
प्रदेश में कुल कचरा (प्रतिदिन): लगभग 3800 टन
रायपुर में कचरा (प्रतिदिन): 700 से 750 टन
रायपुर में हर महीने प्रोसेसिंग का खर्च: 5 से 6 करोड़ रुपए
केंद्रीय नियमों के अंतर्गत प्रदेश में होटल, मॉल, हॉस्पिटल, कॉलोनियों और सोसायटियों ने बल्क वेस्ट जनरेटर नियमों के तहत पंजीयन प्रारंभ कर दिया है। पंजीकरण के बाद हमारी टीमें मौके पर जाकर निरीक्षण करेंगी। 10 लाख से अधिक आबादी वाले शहरों को आगामी एक वर्ष के भीतर यानी 31 मार्च 2027 तक इस पूरी प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से पूर्ण करना है।