
Jhiram attack: झीरम घाटी हमले में 13 साल बाद आया एनआईए के विशेष न्यायालय का फैसला तो पीडि़तों को सांत्वना दे सकता है, लेकिन उस हमले में बचे कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनके दिल में अभी भी उस हमले के जख्म हरे हैं। उन्होंने बताया कि किस तरह से नक्सलियों ने सड़क ब्लॉक करने के बाद सुनियोजित तरीके से हमला किया। इसके बाद हर गाड़ी में जाकर देखने और नाम पूछने के बाद मारा। वहीं, मृतक और गंभीर रूप घायल होने की पुष्टि होने के बाद ही जंगल के रास्ते फरार हो गए। आज भी उस हमले को याद करते हुए वरिष्ठ नेताओं को खोने की यादें ताजा होते ही उनकी आंखें नम हो जाती हैं। उन्होने बताया कि किस तरह नक्सलियों ने हमला किया था।
हमले में घायल डॉ. चौलेश्वर चंद्राकर (दुर्ग संभाग किसान मोर्चा प्रभारी) ने बताया कि सुकमा रेस्ट हाउस में भोजन करने के पश्चात प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार पटेल ने सभी को एकसाथ निकलने का निर्देश दिया। उस समय महेंद्र कर्मा काफिले में जाने के लिए मना कर रहे थे, लेकिन बाद में तैयार हो गए। नंदकुमार पटेल ने मुझे हिदायत दी कि विद्या भैय्या आराम से आएंगे हड़बड़ी नहीं करेंगे। काफिला आगे बढ़ते ही दरभा घाटी में एंबुस के 4 किलोमीटर के पहले गोलीबारी शुरू हो गई। हम लोग योगेंद्र शर्मा की गाड़ी में बैठे थे, उसी में ताबड़तोड़ फायरिंग हुई।
गोली लगने से योगेंद्र और पजेरो वाहन चला रहे चालक राजेश चंद्राकर की मृत्यु हो गई। वहीं, अभिषेक गोलछा गंभीर रूप से घायल हो गए। बाद में उनकी मृत्यु हो गई। चौलेश्वर चंद्राकर ने बताया कि मुझे भी गोली। उस समय मैं लगातार महामृत्युंजय मंत्र का जाप करता रहा। इस बीच नक्सली लगातार गोलियां चला रहे थे। बाद में सभी गाड़ियों को चेक कर सबको पहाड़ में ले जाकर बंधक बनाकर रखा गया था। इस दौरान उन्होने हिदायत देते हुए कहा कि नेताओं के साथ घूमना नहीं और पुलिस के साथ जंगल में नहीं आना।
हमले में घायल हुए तत्कालीन पीसीसी सचिव शिव सिंह ठाकुर ने बताया कि शाम करीब 3.30 बजे हमला हुआ। इस दौरान करीब 2.30 घंटे से अधिक समय तक नक्सली लगातार फायरिंग कर घायलों से नाम पूछकर मारते रहे। खास तौर पर नंदकुमार पटेल और महेन्द्र कर्मा का नाम सभी से पूछने के बाद पुष्टि होने पर गोली मारी। नक्सली हर गाडी़ के पास जाकर देख रहे थे कि कोई बचा तो नहीं। गोली लगने से वह भी घायल हो गए थे। उन्होंने बताया कि आज भी उनके शरीर में गोलियों के छर्रे घंसे हुए हैं। नक्सलियों के जाने के बाद किसी तरह 1 किमी पैदल चलने के बाद फोर्स के जवान मिले।
पीसीसी के तत्कालीन प्रदेश सचिव डॉ. शिवनारायण द्विवेदी ने बताया कि उनके साथ महेन्द्र कर्मा, फूलोदेवी नेताम थे और मलकीत सिंह गेंदू गाडी़ चला रहे थे। दरभा घाटी में पहुंचते ही नक्सलियों ने गोलियों की बौछार और ग्रेनेड फेकने लगे। हमले के बाद कुछ समय सभी गाड़ी से नीचे उतरे। इस दौरान नक्सलियों ने महेन्द्र कर्मा का नाम पूछा। इस दौरान महेन्द्र कर्मा ने कहा कि क्यों मार रहे हो। इसकी पुष्टि होते ही जंगल में ले जाकर उन्हें गोली मार दी।