रायपुर

Patrika Exclusive: अब नारियल नहीं, मशीन बताएगी जमीन के नीचे कहां है जलधारा, बोरिंग से पहले होगी भूजल की जांच

Patrika News: आधुनिक मशीन से जमीन के नीचे पानी की तलाश होगी। बोरिंग से पहले भूजल की जांच कर मिट्टी की परतों, चट्टानों और फ्रैक्चर जोन का अध्ययन किया जाएगा।
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Sep 22, 2026
Patrika Exclusive
जमींन के नीचे पानी की जाँच करते (Photo Patrika)

Patrika Exclusive: @ताबीर हुसैन। गर्मी आते ही गांवों में पानी की तलाश तेज हो जाती है। किसान बोरिंग कराते हैं, लेकिन कई बार पानी नहीं मिलता और बार-बार की खुदाई खर्च बढ़ाती जाती है। ऐसे में अब भूजल की तलाश के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। जमीन के भीतर की संरचना, चट्टानों और संभावित फ्रैक्चर जोन की जांच कर यह पता लगाने की कोशिश की जाती है कि किस स्थान पर बोरिंग करने पर पानी मिलने की संभावना है। रायपुर निवासी देव वर्मा पिछले पांच-छह वर्षों से इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं। उन्होंने भूविज्ञान में बीएससी और एमएससी किया है तथा हैदराबाद से हाइड्रोजियोलॉजी का कोर्स किया है। उनके अनुसार आधुनिक मशीन की मदद से जमीन के नीचे पानी की स्थिति, गहराई और मिट्टी की परतों की संरचना का अध्ययन किया जाता है।

तांबे की छड़ और सिक्कों से भी अनुमान की परंपरा

देव बताते हैं कि भूजल खोजने के पारंपरिक तरीकों में नारियल का इस्तेमाल आज भी कई जगहों पर किया जाता है। इसके अलावा कुछ लोग तांबे की छड़, अंडे, लोटे या सिक्कों के माध्यम से भी जमीन के नीचे पानी होने का अनुमान लगाते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। उनके अनुसार बारिश का पानी जमीन के भीतर जाकर भूजल को रिचार्ज करता है। पहले प्राकृतिक रूप से पानी के जमीन में जाने के रास्ते अधिक खुले थे, लेकिन बड़े निर्माण, खदानों और शहरीकरण के कारण कई जगह प्राकृतिक जल प्रवाह प्रभावित हुआ है। इससे भूजल रिचार्ज की स्थिति भी बदल रही है।

सतह के नीचे की संरचना को पढ़ती है मशीन

आधुनिक तकनीक की खासियत यह है कि इसमें केवल यह अनुमान लगाने की कोशिश नहीं की जाती कि सीधे पानी मौजूद है या नहीं, बल्कि जमीन के भीतर की संरचना का अध्ययन किया जाता है। चट्टानों की स्थिति, मिट्टी की परतें और उनके बीच मौजूद संभावित दरारों यानी फ्रैक्चर जोन को देखा जाता है। देव के मुताबिक कई इलाकों में चट्टानों की संरचना एस, यू या वी आकार की हो सकती है। कहीं चट्टान सूखी मिलती है तो कहीं उसके बीच मौजूद फ्रैक्चर जोन में पानी मिलने की संभावना बनती है। इसलिए बोरिंग के लिए स्थान तय करने से पहले जमीन की संरचना को समझना महत्वपूर्ण है।

हर साल बोरिंग का खर्च कम करने की कोशिश

देव के अनुसार कई किसान पानी की तलाश में एक से अधिक बार बोरिंग कराते हैं। हर प्रयास में पैसा और समय खर्च होता है। ऐसे में बोरिंग से पहले जमीन की जांच करने वाली तकनीक का उद्देश्य सही स्थान चुनने में मदद करना है, ताकि अनावश्यक खुदाई और खर्च को कम किया जा सके। बालोदाबाजार, तिल्दा और आसपास के कुछ क्षेत्रों का उदाहरण देते हुए वे बताते हैं कि कई जगह पारंपरिक तरीकों से भी किसानों ने पानी की तलाश की है और कुछ स्थानों पर सफलता मिली है। आधुनिक तकनीक जमीन के भीतर की संरचना का वैज्ञानिक अध्ययन करके निर्णय लेने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिक तकनीक भरोसेमंद

मशीनों से पानी की जांच अधिक प्रभावी और विश्वसनीय होती है। हमारे पास आधुनिक उपकरण और उन्नत जियोफिजिकल तकनीक उपलब्ध हैं, जिनके माध्यम से वैज्ञानिक तरीके से पानी की जांच की जाती है। तांबे की छड़, नारियल या इसी तरह के पारंपरिक तरीकों को वैज्ञानिक जांच का आधार नहीं माना जा सकता। कई बार इन तरीकों से पानी की सही जगह का अनुमान लग जाता है, लेकिन कई बार ऐसा नहीं होता। इसलिए इसे किसी चमत्कार के बजाय संयोग माना जा सकता है। भूजल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए वैज्ञानिक तकनीक और उपकरणों से की गई जांच अधिक भरोसेमंद है।

चंदन कुमार सिंह, असिस्टेंट प्रोफेसर, वाटर रिसोर्स स्पेशलाइजेशन

Updated on:
22 Sept 2026 02:17 pm
Published on:
22 Sept 2026 08:44 am