
Agricultural Plastic Pollution: मानसून की बारिश जहां किसानों के लिए हर साल नई उम्मीदें और अच्छी फसल का संदेश लेकर आती है, वहीं इस बार बारिश अपने साथ एक ऐसा संकट भी लेकर आई है, जो आने वाले वर्षों में खेती, पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य पर गंभीर असर डाल सकता है। प्रदेश के कई जिलों में नदी-नालों और जल निकासी तंत्र के जरिए बहकर आए प्लास्टिक कचरे ने खेतों को प्रदूषित कर दिया है। धान की बुवाई के समय किसानों को खेत तैयार करने के बजाय उनमें फैली पॉलिथीन, गुटखा-तंबाकू के रैपर, बेकरी पैकेजिंग और सिंगल-यूज प्लास्टिक को हटाने में मशक्कत करनी पड़ रही है।
पत्रिका की ग्राउंड रिपोर्ट में सामने आया कि कई ग्रामीण इलाकों में बारिश के पानी के साथ नालों और जल निकासी मार्गों से बड़ी मात्रा में प्लास्टिक कचरा सीधे खेतों तक पहुंच गया है। खेतों में प्लास्टिक की मोटी परत बिछ जाने से किसान ट्रैक्टर चलाने और बुवाई करने में भी दिक्कत महसूस कर रहे हैं। किसानों का कहना है कि पहले खेतों में केवल प्राकृतिक अवशेष आते थे, लेकिन अब हर बारिश के बाद प्लास्टिक कचरा बड़ी समस्या बन चुका है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इस प्लास्टिक कचरे को समय रहते नहीं हटाया गया, तो यह धीरे-धीरे छोटे-छोटे कणों में टूटकर माइक्रोप्लास्टिक में बदल जाएगा। यही माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी में मिलकर उसकी गुणवत्ता को नुकसान पहुंचाएगा और पौधों की जड़ों के माध्यम से खाद्य श्रृंखला (Food Chain) में प्रवेश कर सकता है। इसका असर केवल खेती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भूजल, पशुओं और अंततः इंसानों के स्वास्थ्य पर भी पड़ेगा।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने कृषि भूमि में बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण को महासागरों के प्रदूषण जितनी गंभीर वैश्विक पर्यावरणीय चुनौती बताया है।
खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) की रिपोर्ट के अनुसार, समुद्रों की तुलना में कृषि भूमि में माइक्रोप्लास्टिक जमा होने का खतरा कहीं अधिक है। अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक मिट्टी की भौतिक संरचना को प्रभावित करता है। इससे मिट्टी की जल धारण क्षमता घटती है और केंचुओं सहित मिट्टी में रहने वाले उपयोगी जीवों का जीवन प्रभावित होता है।
राजिम क्षेत्र के किसान लोकेश, सुखराम, प्रभुलाल, संतोष कुमार, राजा यादव, दिनु, अशोक, ईश्वर, महेश और ओमप्रकाश सहित कई किसानों ने प्रशासन से प्रतिबंधित प्लास्टिक के निर्माण और बिक्री पर प्रभावी कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने कहा कि सिंगल-यूज प्लास्टिक की बिक्री पूरी तरह रोकी जाए। मेलों और बाजारों में प्लास्टिक के उपयोग पर सख्ती हो। नालों और जल निकासी मार्गों की नियमित सफाई कराई जाए। खेतों तक प्लास्टिक पहुंचने से रोकने के लिए विशेष अभियान चलाया जाए।
छत्तीसगढ़ में वर्ष 2017 से प्लास्टिक पर प्रतिबंध लागू है। वर्ष 2023 में 'छत्तीसगढ़ प्लास्टिक एवं अन्य गैर-बायोडिग्रेडेबल सामग्री नियम' लागू कर इसे और सख्त बनाया गया। इसके बावजूद सिंगल-यूज प्लास्टिक, थर्माकोल और डिस्पोजेबल कप-प्लेट का खुलेआम उपयोग जारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि नियमों का प्रभावी पालन नहीं होने के कारण ही प्लास्टिक कचरा नालों से बहकर खेतों तक पहुंच रहा है।
डॉ. विनोद नायक वैज्ञानिक, कृषि विज्ञान केंद्र, गरियाबंद: डॉ. नायक के अनुसार मिट्टी केवल मिट्टी नहीं, बल्कि करोड़ों सूक्ष्मजीवों का जीवित संसार है। माइक्रोप्लास्टिक इन सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रभावित करता है, जिससे मिट्टी की उर्वरता लगातार कम होती जाती है।
डॉ. मनीष चौरसिया वरिष्ठ वैज्ञानिक, सॉइल साइंस एंड एग्रीकल्चर केमिस्ट्री, कृषि विश्वविद्यालय: उनका कहना है कि प्लास्टिक के कण मिट्टी की जल सोखने की क्षमता कम कर देते हैं और लाभकारी सूक्ष्मजीवों को नष्ट करते हैं। सबसे चिंता की बात यह है कि यही माइक्रोप्लास्टिक हमारी खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव शरीर तक पहुंच सकता है।
डॉ. एम.पी. त्रिपाठी चीफ साइंटिस्ट एवं विभागाध्यक्ष, सॉइल एंड वाटर इंजीनियरिंग, स्वामी विवेकानंद कृषि अभियांत्रिकी महाविद्यालय, रायपुर: डॉ. त्रिपाठी बताते हैं कि प्लास्टिक खेतों में प्राकृतिक जल प्रवाह और पौधों की जड़ों के विकास को प्रभावित करता है। इससे पौधों को पर्याप्त नमी नहीं मिलती और उत्पादन घटने लगता है। उनके अनुसार खेतों से प्लास्टिक को हटाना ही इस समस्या का सबसे प्रभावी समाधान है।
विशेषज्ञों का कहना है कि माइक्रोप्लास्टिक अब केवल पर्यावरणीय समस्या नहीं रह गया है। यह धीरे-धीरे फसलों, सब्जियों और अनाज के जरिए मानव शरीर तक पहुंच रहा है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएं पैदा होने की आशंका जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अभी भी प्लास्टिक कचरे के स्रोतों को नहीं रोका गया और जल निकासी तंत्र की नियमित सफाई नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में कृषि भूमि की उत्पादकता, मिट्टी की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे में प्रतिबंधित प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण, कचरा प्रबंधन और किसानों की जागरूकता ही इस बढ़ते खतरे से बचाव का सबसे कारगर उपाय है।