इतिहासकार और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य डॉ. रहमान अली ने भारतीय मंदिरों की वास्तुकला की उत्पत्ति...
रायसेन. सांची बौद्ध, भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में आयोजित पांच दिवसीय कार्यशाला आधुनिक परिप्रेक्ष्य में भारतीय दर्शन का लेखन विषय पर तीसरे दिन कई गहन विषयों पर चिंतन किया गया।
इतिहासकार और भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के सदस्य डॉ. रहमान अली ने भारतीय मंदिरों की वास्तुकला की उत्पत्ति और विकास पर चर्चा करते हुए बताया कि वेदों में मंदिरों के प्लान, उनके एलिवेशन, क्षितिज और उनकी सजावट, सौंदर्य के बारे में संपूर्ण वर्णन किया गया है।
वेद में मंदिरों के स्तंभ, हॉल, वृत्तों के बारे में इतना सटीक जिक्र किया गया है कि मानों को दैवीय ज्ञान के आधार पर उस दौर के मनुष्यों को मंदिर निर्माण सिखा रहा है।
डॉ.रहमान अली ने देश के 32 मंदिरों के चित्रों को प्रदर्शित कर बताया। इनके आर्किटेक्ट में एक सटीक गणितीय हिसाब, ज्यामीति और तर्क दिखाई पड़ता है। उनका नींव से शिखर तक एक-एक इंच का नाप वर्णित किया गया है।
ये सब विष्णु धर्मोत्तर पुराण में लिखा है। शांति निकेतन की डॉ. आशा मुखर्जी ने नोबल पुरस्कार विजेता गुरु रविंद्रनाथ टैगोर की धर्म की अवधारणा को प्रस्तुत किया। उनके अनुसार टैगोर ने जिस मानवतावाद को अपनी इस पुस्तक के माध्यम से प्रस्तुत किया है वो अद्वैत वेदांत दर्शन के करीब है।
टैगोर कहते थे, जैसे ही मैं ईश्वर से अलग हुआ मैं ईश्वर की आराधना के लिए स्वतंत्र हो गया। स्वामी विवेकानंद भी टैगोर के इस कथन से प्रभावित थे। टैगोर एक कवि के साथ दार्शनिक थे, संगीतज्ञ थे और चित्रकार थे। प्रो. एस पनीरसेलवम ने आधुनिक भारतीय विचार के विभिन्न आयामों को प्रस्तुत किया।
डॉ. रहमान अली ने भारतीय मंदिरों की वास्तुकला की उत्पत्ति और विकास पर चर्चा करते हुए बताया कि वेद में मंदिरों के स्तंभ, हॉल, वृत्तों के बारे में इतना सटीक जिक्र किया गया है कि मानों को दैवीय ज्ञान के आधार पर उस दौर के मनुष्यों को मंदिर निर्माण सिखा रहा है।
प्रो. गोदावरेश मिश्र ने गौतम बुद्ध को लेकर शंकराचार्य के मतों को प्रस्तुत किया। डॉ मीनल कतरनिकर ने यथार्थ, ज्ञान तथा चेतना के विषय पर तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया।