mp news: कभी सड़कों के नाम पर थे सिर्फ पत्थर, अब फोरलेन और उद्योगों का बिछा जाल, रियासत से मेट्रो रीजन तक विकास की बड़ी छलांग
(रिपोर्ट-लक्ष्मीनारायण यादव, राजगढ़)
mp news: आजादी के बाद मई 1948 में छोटी-बड़ी रियासतों के मेल से आकार लेने वाला राजगढ़ जिला आज अपने गठन के 78वें साल में बदलाव की एक ऐतिहासिक इबारत लिख रहा है। कभी मानसून के भरोसे रहने वाला और संसाधनों के लिए तरसने वाला यह जिला अब विकास की ऐसी छलांग लगा चुका है, जहां अतीत की सादगी और भविष्य की आधुनिकता का संगम नजर आता है। आज राजगढ़ न केवल बुनियादी सुविधाओं में आत्मनिर्भर हुआ है, बल्कि मेट्रोपॉलिटन रीजन में शामिल होकर बड़े निवेश और संभावनाओं के नए द्वार खोल रहा है।
जिले की स्थापना के समय स्थितियां बेहद चुनौतीपूर्ण थीं। वरिष्ठ साहित्यकार उमराव सिंह लाखनोत बताते हैं, गठन के वक्त राजगढ़ दरबार ने सरकार को 42 लाख रुपए की राशि सौंपी थी, जिससे विकास का पहिया घूमना शुरू हुआ। उस दौर में खेती महज 10 फीसदी जमीन पर होती थी और सिंचाई के लिए चरस का सहारा लिया जाता था। सड़कें पत्थरों की बनी थीं और व्यापार के नाम पर कागज के दूमले में नमक-मिर्च बिकना ही मुख्य व्यवसाय था। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर पूरे जिले में केवल दो हायर सेकेंडरी स्कूल और एक बड़ा विनय अस्पताल ही मौजूद था।
आज का राजगढ़ पक्की सड़कों और फोरलेन हाईवे के जाल से ढका हुआ है। मोहनपुरा जैसी सिंचाई परियोजनाओं ने यहां की बंजर भूमि को सोना उगलने वाली मिट्टी में तब्दील कर दिया है। कृषि आधारित अर्थव्यवस्था अब उद्योगों और निवेश की ओर कदम बढ़ा रही है। जिले को अब पर्यटन हब बनाने की दिशा में काम शुरू हो गया है, जिससे स्थानीय रोजगार को नई दिशा मिलेगी। राजगढ़ अब केवल एक भौगोलिक सीमा नहीं, बल्कि मेट्रोपॉलिटन रीजन का हिस्सा बनकर बड़े महानगरों की तर्ज पर विकसित होने को तैयार है। छोटी रियासतों के एकीकरण से शुरू हुई यह यात्रा अब वैश्विक निवेश और शहरी सुविधाओं के सपने को साकार कर रही है। साक्षरता से लेकर स्वास्थ्य तक, राजगढ़ ने साढ़े सात दशकों में जो दूरी तय की है, वह जिले की अटूट जिजीविषा और प्रशासनिक प्रयासों का जीवंत प्रमाण है।
बैलगाड़ी मुख्य साधन, अब रेल और सड़कों का जाल
गठन के समय न रेल थी न अच्छी सड़कें। 1970 के दशक में मक्सी-रुठियाई ट्रैक बनने से रेल सेवा शुरू हुई। अब जिले का ब्यावरा रेलवे जंक्शन बनने जा रहा है। लगभग सभी गांव सडक़ों से जुड़े हैं। दो प्रमुख NH-46 और NH-52 ने जिले को पूरे देश से कनेक्टिविटी मुहैया कराई है।
पहले घर में होती थी डिलेवरी, अब गांवों में पहुंची स्वास्थ्य सेवाएं
आजादी के समय मुख्यालय पर एकमात्र विनय अस्पताल बना। अब स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी जिला काफी आगे बढ़ा है। राजगढ़ में मेडिकल कॉलेज और ब्यावरा में ट्रामा सेंटर खुलने के बाद और सुधार की संभावना है। जिला अस्पताल के सिविल सर्जन डॉ. नितिन पटेल बताते हैं कि स्वास्थ्य में पहले की अपेक्षा काफी सुधार हुआ है। यदि हम आजादी के बाद और 20वीं सदी के आखिरी समय की बात करें तो इस समय गांवों में अधिकांश महिलाओं की डिलेवरी घरों में ही होती थी। अब पूरा परिदृश्य बदला है। हां अब भी सुधार की जरूरत है।
कृषि ने बदली तस्वीर
कृषि व्यवस्था अब पारंपरिक सीमाओं को पार कर चुकी है। मोहनपुरा-कुंडालिया जैसी परियोजनाओं ने खेती का तरीका ही बदल दिया है। ड्रिप इरिगेशन, स्प्रिंकलर सिस्टम आदि ने भी खेती आसान कर दी। बारिश और खरीफ फसलों पर ही जिले की आर्थिक स्थिति टिकी थी। अब जिले में अधिकांश जमीन सिंचित हो रही है। पिछले कुछ सालों में ही सिंचाई का रकबा 8-10 गुना तक बढ़ा है। गर्मी के सीजन में भी किसान फसलें उगा रहे है।
शिक्षा में भी हुआ बदलाव
1950 के दशक में जिले में कुछ ही स्कूल थे, आज दो हजार से अधिक प्राथमिक से लेकर हायर सेकंडरी विद्यालय हैं। नवोदय विद्यालय, आदर्श महाविद्यालय, पॉलिटेक्निक संस्थान जैसे शिक्षा के नए केंद्र बने हैं। साथ ही अब मेडिकल कॉलेज बनने से जिले को एक नई पहचान मिलेगी।
ये चुनौतियां भी-
गर्मियों में जल संकट, बड़े स्तर पर रोजगार की कमी, शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की आवश्यकता, विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी, उद्योग और रोजगार की कमी।
क्षेत्रफल-6,153 वर्ग किमी (25वां स्थान प्रदेश में)
उत्तरीय सीमा- राजस्थान
तहसील- 7
ग्रामों की संख्या- 1,728
जनसंख्या- 1,545,814 (२०११ के अनुसार)
जनसंख्या घनत्व- 251 व्यक्ति प्रति वर्ग किमी
साक्षरता दर- 70.06%
लिंगानुपात- 956
शिशु लिंगानुपात- 912
(नोट- ये लोगो (सिंबोल) के साथ लगाना है।)