
Rajgarh Well Collapse: एमपी में राजगढ़ के खिलचीपुर में हुए हादसे ने न केवल एक हंसते-खेलते परिवार को उजाड़ दिया। बीते दिन जनपद सदस्य मुकेश दांगी के खेत में तैयार हो रहे नए कुएं के पास सब कुछ सामान्य था। मजदूर काम पूरा होने के बाद खाना खा रहे थे। परिवार के लोग भी खेत पर मौजूद थे। लेकिन कुछ ही क्षणों में खुशियों का माहौल मातम में बदल गया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दांगी के खेत पर कुएं का मुचय निर्माण कार्य लगभग पूरा हो चुका था। फर्मे (सीसी युक्त सुरक्षा दीवार) के माध्यम से कुएं को अंतिम रूप दिया जा रहा था। तभी हादसा हो गया।
बताया जा रहा है कि कुआं खुदने की खुशी में खेत पर ही दाल-बाटी बनाई गई थी। दोपहर को काम रुकने पर सभी ने आनंद के साथ भोजन किया। मुकेश दांगी, उनकी मां रूपाबाई और पत्नी पिंकीबाई ने भी हादसे से 6 मिनट पहले दाल-बाटी खाई थी। मजदूर भी वहीं पास में बैठकर खाना खा रहे थे। भोजन करने के बाद सास-बहू के मन में विचार आया कि वे अपने मवेशियों के पानी पीने के लिए कुएं के पास ही एक होदी (ठेल) बनवा लेती हैं।
उन्होंने भोजन कर रहे मजदूरों से कहा भी था कि तुम लोग खाना खाकर थोड़े रुक जाना, हमारे लिए मवेशियों की एक होद भी बना देना। इसी होदी के निर्माण के लिए कुएं के ठीक किनारे पर गिट्टी और रेत का ढेर लगा हुआ था। गिट्टी को बिखरा देख रूपाबाई उसे व्यवस्थित करने लगीं और उन्हें काम करता देख बहू पिंकीबाई भी मदद के लिए हाथ बंटाने पहुंच गईं। दोनों महिलाएं कुएं की मुंडेर के बिल्कुल पास खड़ी होकर काम कर रही थीं, तभी अचानक वहां की जमीन हिली और पलक झपकते ही दोनों काल के गाल में समा गईं।
घटना से पूरा गांव स्त़ध है। रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान सैकड़ों ग्रामीणों की आंखें नम थीं और हर कोई ईश्वर से किसी चमत्कार की प्रार्थना कर रहा था। गांव के बुजुर्गों ने बताया कि रूपाबाई और बहू पिंकीबाई के बीच कभी सास-बहू जैसा पारंपरिक रिश्ता नहीं रहा। दोनों हमेशा मां-बेटी की तरह रहती थीं। घर का काम हो या खेत का, दोनों हमेशा साथ ही आया-जाया करती थीं। हादसे ने जनपद सदस्य मुकेश दांगी को पूरी तरह तोड़कर रख दिया है। उनके तीन छोटे बच्चे हैं, जिनमें दो बेटियां और एक बेटा शामिल है। इन मासूमों के सिर से एक ही झटके में उनकी मां और दादी दोनों का साया हमेशा के लिए उठ गया है। गांव के लोग भर्राए गले से कह रहे थे कि आज स्थिति यह है कि मुकेश के घर में रोने वालों को संभालने और चूल्हा जलाने वाला भी कोई नहीं बचा है।
मुकेश बचपन का साथी ने बताया कि हम लोगों के देखते ही देखते मिट्टी धंस गई। प्रशासन की टीम ने पूरी मशक्क्त की, जेसीबी और पोकलेन से मिट्टी हटाने के प्रयास हुए। हर किसी को उनके जीवित बाहर निकलने की आस थी लेकिन जैसे-जैसे समय बीत रहा था, आस टूटती गई। आखिरकार चार से पांच घंटे की देरी में शव ही निकाले जा सके। एसडीआरएफ और प्रशासन की टीम ने मेहनत की, लेकिन हमें निराशा ही मिली। मुकेश के घर में अब कोई चूल्हा जलाने वाला नहीं बचा।
दोपहर करीब दो बजे जैसे ही कुआं धंसने की तेज आवाज और चीख- पुकार गूंजी, आसपास के खेतों में काम कर रहे ग्रामीण बदहवास होकर घटना स्थल की ओर दौड़े। गांव में महिलाओं के जिंदा दफन होने की खबर मिलते ही हड़कंप मच गया। ग्रामीणों ने प्रशासन के आने का इंतजार किए बिना तत्काल अपने स्तर पर फावड़ों, तगाड़ियों और जो भी संसाधन मिले, उनकी मदद से मिट्टी हटाना शुरू कर दिया। लेकिन, 75 फीट गहरे कुएं में इतनी भारी मात्रा में मलबा गिरा था कि कुआं ऊपर तक भर चुका था।
ऊपर से गीली मिट्टी बार-बार नीचे खिसक रही थी, जिससे ग्रामीणों के प्रयास नाकाफी साबित हुए। इसके बाद तुरंत खिलचीपुर पुलिस और प्रशासनिक अमले को सूचना दी गई। मौके की गंभीरता को देखते हुए प्रशासन ने बिना समय गंवाए खिलचीपुर और आसपास के क्षेत्रों से तीन पोकलेन और चार जेसीबी मशीनें घटना स्थल पर बुलवाईं। कई घंटों तक लगभग 100 से अधिक कर्मचारियों की टीम वहां रही। पुलिस ने शव को अस्पताल में रखवाया है। आज पोस्टमॉर्टम होगा।
पानी के छिड़काव से कमजोर हुई मिट्टी हादसे के पीछे तकनीकी लापरवाही का बड़ा पहलू भी सामने आ रहा है। कुएं की आरसीसीबाउंड्री को मजबूती देने के लिए पिछले कुएं के आसपास की जमीन पर लगातार पानी का छिड़काव किया जा रहा था। कुएं की गहराई लगभग 75 फीट (33 हाथ) थी। लगातार पानी सोखने के कारण कुएं के मुहाने के आसपास की मिट्टी अत्यधिक गीली और भारी हो चुकी थी। हालांकि, सुरक्षा के लिहाज से बाउंड्री में लोहे की सेंट्रिंग भी लगी हुई थी, लेकिन भारी गिट्टी के ढेर और गीली मिट्टी के दबाव को वह ढाल नहीं संभाल सकी। जैसे ही मिट्टी धंसी, वह अपने साथ लोहे के फर्मे और आरसीसी के भारी-भरकम ढांचे को लेकर कुएं के नीचे बैठ गई।