
Dussehra 2026: असत्य पर सत्य की जीत का प्रतीक दशहरा देशभर में रावण दहन के साथ मनाया जाता है, लेकिन राजगढ़ जिले के किला अमरगढ़ गांव में करीब 300 साल पुरानी परंपरा आज भी अनूठे अंदाज में निभाई जाती है। यहां रावण का दहन नहीं होता, बल्कि भगवान राम उसकी नाभि में तीर मारकर उसका अंत करते हैं। तीर लगते ही प्रतिमा के भीतर रखा मटका फूटता है और नाभि से लाल रंग बाहर निकलता है। इसी के साथ रावण का अंत मानकर ग्रामीण दशहरे का पर्व मनाते हैं। यह परम्परा उसी समय से चली आ रही है।
जिला मुख्यालय से करीब 22 किलोमीटर दूर राजस्थान सीमा के पास बसे किला अमरगढ़ गांव में गोगढ़िया नाले के किनारे रावण और उसके परिवार की प्रतिमाएं स्थापित हैं। ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा रियासत काल से चली आ रही है, हालांकि इसके पीछे का स्पष्ट इतिहास किसी को ज्ञात नहीं है। हर साल दशहरे पर प्रतिमाओं का रंग-रोगन किया जाता है और विधि-विधान से परंपरा निभाई जाती है।
गांव के सरपंच गजराज सिंह तंवर के अनुसार, दशहरे पर राम मंदिर से विमान के साथ चल समारोह निकाला जाता है। इसमें बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल होते हैं। ढोल-धमाकों के साथ यह चल समारोह गांव की सीमा पर स्थित गोगढ़िया नाले के किनारे पहुंचता है। यहां भगवान राम की ओर से रावण की नाभि में तीर मारा जाता है। प्रतिमा के भीतर रखे मटके में लाल रंग भरा रहता है। तीर लगने से मटका फूटता है और नाभि से लाल रंग बाहर निकलता है। इस दृश्य के साथ ही रावण का अंत माना जाता है।
किला अमरगढ़ में रावण के साथ उसकी पत्नी मंदोदरी, बेटे मेघनाद, भाई विभीषण सहित परिवार के अन्य सदस्यों की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। सभी प्रतिमाओं को रावण के दरबार में बैठे हुए दर्शाया गया है, जबकि कुंभकरण की प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में है। इन प्रतिमाओं की ऊंचाई करीब 12 से 15 फीट तक है। दशहरे पर रंग-रोगन के बाद पूरा आयोजन परंपरागत तरीके से किया जाता है।
रियासत काल में जब किला अमरगढ़ राजगढ़ की जागीर हुआ करता था, तभी से यहां ये प्रतिमाएं स्थापित हैं। हम हर साल दशहरा मनाने गांव आते हैं। परिवार के कई सदस्य इंदौर, मुंबई, बेंगलुरु और विदेश में रहते हैं, लेकिन सभी का प्रयास रहता है कि गांव आकर सामूहिक रूप से दशहरा पर्व मनाया जाए। -अजय सिंह, राज परिवार, किला अमरगढ़