Naxal News: सरेंडर नक्सलियों ने खुलासा किया है कि उच्च स्तर से कोई फंड नहीं मिलता बल्कि लोकल में फंड जुटाते थे, तब कहीं जाकर संगठन की गतिविधियां चलती थी।
CG Naxal News: कभी सरकारी तंत्र से संघर्ष और कथित प्रताडऩा के चलते हथियार उठाने को मजबूर हुए नक्सली अब मुख्यधारा में लौटकर सामान्य जीवन जीना चाहते हैं। खैरागढ़ जिले में आत्मसमर्पण करने वाले 15 नक्सलियों ने अपनी आपबीती साझा करते हुए बताया कि परिस्थितियों ने उन्हें हिंसा के रास्ते पर धकेला, लेकिन अब वे परिवार और समाज के बीच रहकर नई शुरुआत करना चाहते हैं।
सरेंडर नक्सलियों ने खुलासा किया है कि उच्च स्तर से कोई फंड नहीं मिलता बल्कि लोकल में फंड जुटाते थे, तब कहीं जाकर संगठन की गतिविधियां चलती थी। इन आत्मसमर्पित नक्सलियों में एक दंपती समेत सभी की इच्छा अपने परिवार के साथ रहकर रोजगार से जुडऩे की है। कोई सिलाई, कोई वाहन चालक बनने तो कोई खेती, मछलीपालन और मुर्गीपालन जैसे कार्यों में रुचि दिखा रहा है। जिला पुलिस की ओर से उन्हें प्रशिक्षण देने की तैयारी की जा रही है।
एमएमसी जोन के पूर्व सीसी मेंबर भज्जीदेव उर्फ रामधेय ने बताया कि वे 19 वर्ष की उम्र में नक्सल संगठन से जुड़े। बड़े भाई के नक्सली होने के कारण घर पर लगातार पुलिस दबिश और वन विभाग की कार्रवाई से परिवार परेशान था। गांव के आरक्षित वन क्षेत्र में आने के बाद विस्थापन की स्थिति बनी, जिसके चलते उन्हें बीजापुर छोडक़र गढ़चिरौली जाना पड़ा।
उन्होंने बताया कि इन परिस्थितियों ने उन्हें हथियार उठाने पर मजबूर किया। करीब 35 वर्षों तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद अब उन्होंने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया है। उनका कहना है कि अब वे गांव लौटकर परिवार के साथ रहना और समाज सेवा करना चाहते हैं।
भज्जीदेव ने बताया कि वे वर्ष 2009 में मदनवाड़ा क्षेत्र में हुई मुठभेड़ में शामिल थे, जिसमें एसपी विनोद चौबे सहित 29 जवान शहीद हुए थे। बताया कि बस्तर, गढ़चिरौली और राजनांदगांव क्षेत्र में कई घटनाओं में उनकी भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि संगठन के दौरान उन्होंने अपने कई साथियों को मुठभेड़ों में खोया और जंगलों में कठिन परिस्थितियों में जीवन बिताया।
आत्मसमर्पित नक्सलियों का कहना है कि अब उनकी प्राथमिकता परिवार है। कई लोग 20-22 वर्षों से अपने घर नहीं जा पाए थे। अब वे खेती, पशुपालन, मछलीपालन जैसे कार्यों के जरिए जीवन यापन करना चाहते हैं। महिला नक्सलियों में भी बदलाव की इच्छा स्पष्ट दिखी है। कुछ महिलाएं सिलाई कार्य सीखकर रोजगार शुरू करना चाहती हैं। एक दंपत्ति खेती और सिलाई-कंप्यूटर कार्य के माध्यम से जीवनयापन करना चाहता है, जबकि एक अन्य युवक ट्रैक्टर चालक बनने के लिए प्रशिक्षण लेना चाहता है।
भज्जीदेव ने बताया कि संगठन में रहने के दौरान उन्हें ऊपरी स्तर से आर्थिक मदद नहीं मिलती थी। स्थानीय स्तर पर ही धन एकत्र करना पड़ता था और आवश्यक संसाधनों की व्यवस्था भी स्वयं करनी होती थी। उन्होंने बताया कि एमएमसी जोन बालाघाट, गोंदिया और बकरकट्टा क्षेत्र में सक्रिय था। सुरक्षा बलों का दबाव बढऩे के बाद उन्होंने आत्मसमर्पण का निर्णय लिया। प्रारंभ में गातापार थाना क्षेत्र में सरेंडर की योजना थी, लेकिन दूरी और मुठभेड़ की आशंका को देखते हुए बकरकट्टा थाना में आत्मसमर्पण किया गया।
खैरागढ़ के एसपी लक्ष्य शर्मा ने बताया कि पुनर्वास नीति के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ दिया जा रहा है और उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।