राजस्थान की प्रमुख नदियों में से एक बनास नदी अपने उद्गम कुंभलगढ़ के वीरों का मठ से कुछ ही आगे चलकर अस्तित्व से संघर्ष कर रही है। बड़े स्तर पर पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं व इंसानों की जीवनदायिनी कही जाने वाली बनास खमनोर-मोलेला पुलिया क्षेत्र में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है।
खमनोर. राजस्थान की प्रमुख नदियों में से एक बनास नदी अपने उद्गम कुंभलगढ़ के वीरों का मठ से कुछ ही आगे चलकर अस्तित्व से संघर्ष कर रही है। बड़े स्तर पर पशु-पक्षियों, जीव-जंतुओं व इंसानों की जीवनदायिनी कही जाने वाली बनास खमनोर-मोलेला पुलिया क्षेत्र में अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। यहां नदी के किनारों और बहाव क्षेत्र में पिछले लगभग तीन वर्षों से बड़े-बड़े पत्थरों, निर्माण सामग्री के मलबे और घरेलू कचरे के ढेर जमा हैं।हालात यह हैं कि नदी क्षेत्र अब प्राकृतिक जलस्त्रोत कम और कचरे का डंपिंग यार्ड अधिक दिखाई देने लगा है। इसके बावजूद जिम्मेदार विभागों और प्रशासन ने अब तक कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की है। खमनोर ब्लॉक मुख्यालय पर इस पुलिया के आसपास भारी-भरकम चट्टानें और पत्थरों के ढेर नदी के बहाव क्षेत्र में पड़े हैं। वहीं सिंगल यूज प्लास्टिक, खराब कपड़े, घरेलू कचरा, ध्वस्त भवनों का मलबा और अपशिष्ट सामग्री खुलेआम नदी में डाली जा रही है। कचरे के बड़े-बड़े ढेर जमा होने से नदी की सेहत तो बिगड़ ही रही है, इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी नष्ट हो रही है। स्थानीय नागरिकों का कहना है कि वर्षों से नदी क्षेत्र में मलबा डालने का सिलसिला जारी है, लेकिन प्रशासन ने इसे रोकने के लिए अब तक कोई भी ठोस कदम नहीं उठाया है। लोगों का आरोप है कि यदि समय रहते कार्रवाई की जाती तो आज बनास नदी की ऐसी दुर्दशा नहीं होती।
हर साल बारिश के मौसम में ऊपरी इलाकों से बहकर आया पानी नदी में जब बहता है तो इन विशाल पत्थरों और मलबे के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित होता है। यहां डाली गई गंदगी भी इतनी मजबूती से जम गई है कि टस से मस नहीं होती है। कस्बे से नाली बनाकर यहां तक लाकर छोड़ा जा रहा सीवरेज भी नदी के प्राकृतिक जल को गंदा कर रहा है। यही पानी आगे नंदसमंद बांध तक पहुंचता है, जहां से नाथद्वारा शहर को पेयजल के रूप में भी सप्लाई होती है।स्वच्छता अभियान को लगा रहे पलीताएक ओर सरकार और प्रशासन स्वच्छता अभियान तथा जल संरक्षण के बड़े-बड़े दावे कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बनास नदी के किनारे फैली गंदगी इन दावों की पोल खोलती नजर आ रही है। नदी क्षेत्र में जगह-जगह प्लास्टिक, कपड़े, कचरा और अपशिष्ट बिखरा पड़ा है। स्वच्छता के घटक महज कागजी दिखाई पड़ रहे हैं। स्वच्छता अभियान के मूल उद्देश्य को पलीता लगाया जा रहा है। पानी को गंदा कर आमजन के स्वास्थ्य से भी खिलवाड़ ही जा रही है।
क्षेत्रवासियों का कहना है कि आखिर नदी में लगातार मलबा और कचरा कौन डाल रहा है और उसे रोकने की जिम्मेदारी किसकी है। गैरजिम्मेदार लोग यहां लाकर कचरा डाल रहे हैं तो जिम्मेदार क्यों मौन है? उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई क्यों नहीं की जा रही है? सड़क मार्ग पर सुबह-शाम भ्रमण करने वाले लोग बताते हैं कि नदी क्षेत्र से निकलना मुश्किल हो रहा है। यहां प्राकृतिक सौंदर्य और शुद्ध हवा-पानी की तलाश में आते हैं, लेकिन गंदगी को देखकर नाक-भौं सिकोड़नी पड़ती हैं। कुछ जानकारों ने बताया कि आसपास के इलाकों में चल रहे अवैध बूचड़खानों का वेस्ट और अपशिष्ट भी अंधेरे में यहां लाकर डंप किया जा रहा है। यदि प्रशासन को गंदगी फैलाने वालों की इन सभी कृत्यों की जानकारी है तो वह कार्रवाई क्यों नहीं कर रहा है और यदि जानकारी नहीं है तो भी प्रशासन की गंभीर लापरवाही है।
लोगों का कहना है कि जब सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के स्पष्ट निर्देश हैं, तो खमनोर-मोलेला बनास नदी क्षेत्र में वर्षों से पड़े मलबे और कचरे को हटाने के लिए जिम्मेदार विभाग कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे हैं? स्थानीय ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों एवं विभागों के प्रशासनिक अधिकारियों-कर्मचारियों से मांग की है कि बनास नदी क्षेत्र का तत्काल सर्वे करवाकर मलबा, विशाल पत्थरों और कचरे को हटाया जाए। साथ ही नदी क्षेत्र में कचरा और निर्माण अवशेष डालने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए, ताकि कोई यहां मलबा, कचरा व अपशिष्ट डालकर नदी को गंदा करने के बारे में सोच भी न सके।