जब आसमान आग उगलता है और ज़मीन तवे जैसी तपने लगती है, तब नन्हे परिंदों की तड़प कौन समझे? इंसान छांव और एसी की पनाह में चला जाता है
गिरीश पालीवाल
खमनोर (राजसमंद). जब आसमान आग उगलता है और ज़मीन तवे जैसी तपने लगती है, तब नन्हे परिंदों की तड़प कौन समझे? इंसान छांव और एसी की पनाह में चला जाता है, लेकिन उन बेजुबानों का क्या जो एक कटोरी पानी के लिए तरस जाते हैं? ऐसे ही वक्त में राजसमंद जिले के खमनोर ब्लॉक में कुछ संवेदनशील लोग फरिश्ते बनकर सामने आए हैं, जो परिंदों और मूक प्राणियों के लिए प्राणदायिनी सेवा में लगे हैं।
ये केवल एक अभियान नहीं, संवेदना का संग्राम है। शिक्षक कृष्णगोपाल गुर्जर के नेतृत्व में चल रही यह मुहिम न केवल परिंदों को पानी, दाना और घोंसला उपलब्ध करवा रही है, बल्कि पूरे समाज को सेवा, सह-अस्तित्व और पर्यावरण प्रेम का पाठ भी पढ़ा रही है। कलक्टर परिसर से लेकर स्कूलों, मंदिरों, खेत-खलिहानों, घरों की छतों तक 4,000 से अधिक परिंडे, घोंसले और दाना पात्र बांटे जा चुके हैं। इस साल 16,000 का लक्ष्य रखा गया है। हर स्कूल में बच्चों को सिखाया जा रहा है कि एक परिंडा रखना भी एक पूजा है।
कृष्णगोपाल गुर्जर बताते हैं, “गर्मी में तापमान 45 डिग्री पार कर जाता है। इंसान तो बच जाता है, लेकिन हर साल सैकड़ों परिंदे प्यास से दम तोड़ देते हैं। यही पीड़ा इस मुहिम की शुरुआत बनी।” गुर्जर पिछले दो दशक से मोलेला की भोपा भागल बस्ती स्थित स्कूल में पर्यावरण शिक्षा और सेवा की अलख जगा रहे हैं।
मुहिम में जो घोंसले, परिंडे और चुग्गा पात्र बांटे जा रहे हैं, वे अधिकतर मिट्टी, लकड़ी या पुनर्नवीनीकरण योग्य वस्तुओं से बने होते हैं, ताकि पर्यावरण पर अतिरिक्त भार न पड़े। हालिया समय में प्लास्टिक बोतलों को भी उपयोग में लाया जा रहा है ताकि अधिक मांग पूरी की जा सके।
यह प्रयास केवल चुग्गा पात्र बांटने तक सीमित नहीं। स्कूलों में विशेष कार्यशालाएं करना, बच्चों और युवाओं को जोड़ने के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। यह अभियान समाज को सिखा रहा है कि सेवा का कोई आकार नहीं होता — एक कटोरी पानी और मुट्ठी भर दाना भी जीवनदान बन सकता है। हर मोहल्ले, हर छत पर अगर एक छोटा परिंडा भी रख दिया जाए, तो हजारों जानें बचाई जा सकती हैं।