
राजसमंद. धार्मिक नगरी चारभुजाजी में दशहरे पर रावण दहन की परंपरा सबसे अलग है। यहां रावण, मेघनाद और कुंभकरण के पुतले नहीं बनाए जाते, बल्कि जवाहर मैदान में उनकी प्रतिमाएं बनाकर गोलियों और पत्थरों से जमींदोज किया जाता है। वर्षों से चली आ रही इस अनूठी परंपरा को देखने आस पास के गांवों से बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़े। सरगरा समाज के प्रतिनिधि मांगीलाल सरगरा ने मैदान में तीनों की प्रतिमाएं बनाई गईं। रावण का मुखौटा मटके को फोड़कर तैयार किया गया और उसकी नाभि में मटका रखकर रंग-रोगन किया गया। इसके बाद रावण वध की पारंपरिक रस्मों का सिलसिला शुरू हुआ।
राजसमंद के चारभुजा जी की साइन कसर आरती करीब शाम 4.30 बजे संपन्न होने के बाद मंदिर से राम सेना रवाना हुई। ढोल-नगाड़ों, निशान, छड़ी, चंवर और भगवा ध्वज के साथ निकली राम सेना इमली वाले हनुमान स्थल पहुंची, जहां अस्त्र-शस्त्र का पूजन किया गया। इसके बाद बजरंग दल और दुर्गा वाहिनी की बालिकाओं ने अखाड़ा प्रदर्शन किया। इमली वाले के पास स्थित राम द्वारा अखाड़े में विराजित राम की प्रतिमा को सजाकर पालकी में विराजमान कराया गया। चंवर ढुलाते हुए राम सेना रावण वध के लिए आगे बढ़ी। रास्तेभर जयघोष और नारों से माहौल गूंजता रहा।
परंपरा के अनुसार, सिपाही सोहन सिंह ने बलि प्रथा की रस्म के तहत कद्दू को तलवार से काटा। इसके बाद राम सेना ठीक शाम 5 बजे जवाहर मैदान पहुंची। वहां राम की प्रतिमा को ऊंचे आसन पर विराजमान कराया गया, जबकि देवस्थान विभाग के सिपाही रावण की प्रतिमा पर गोलियां चलाने के लिए तैयार हुए। बंदूकों में गोलियां और बारूद भरे गए। मैदान में मौजूद दर्शकों की निगाहें इस बात पर टिकी थीं कि किस सिपाही की गोली से रावण की प्रतिमा छलनी होगी।
सिपाहियों ने दो-तीन राउंड गोलियां चलाईं, लेकिन रावण की प्रतिमा का वध नहीं हो सका। बंदूकों के ठीक से काम नहीं करने के कारण दर्शकों को निराशा हुई। आखिरकार बालकों की सेना ने पत्थर मार-मारकर रावण की प्रतिमा को जमींदोज किया। राम सेना ने भी शेष प्रतिमा को धराशायी कर दिया। इसके साथ ही मैदान में राम के जयकारे और विजय घोष गूंज उठे।
रावण वध के बाद राम की प्रतिमा को सिर पर धारण कर राम सेना वापस अखाड़े वाले राम मंदिर पहुंची। वहां प्रतिमा को पुनः मंदिर में स्थापित किया गया और आरती की गई। अंत में पुजारी गणेश लाल बगड़वाल ने प्रसाद वितरित किया।