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राजसमंद: मशीनों के दौर में भी मिट्टी की कुश्ती का जुनून बरकरार, कांकरोली का शक्करकुड़ी अखाड़ा सहेजे है सदियों पुरानी विरासत

राजसमंद जिले के कांकरोली में स्थित शक्करकुड़ी अखाड़ा आधुनिक जिम के दौर में भी मिट्टी की कुश्ती और देसी व्यायाम की परंपरा को सहेजे हुए है। यहां पारंपरिक दांव-पेच, मुगदल और हत्थी से अभ्यास के साथ कलारीपयट्टू का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
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rajsamand shakkarkudi akhara kankroli

शक्करकुड़ी अखाड़ा आज भी मिसाल (पत्रिका फोटो)

Rajsamand Shakkarkudi Akhara Kankroli: आधुनिक जिम में मशीनों के बीच पसीना बहाने का चलन भले ही तेजी से बढ़ रहा हो, लेकिन मिट्टी की सौंधी महक और कुश्ती के पारंपरिक दांव-पेच का आकर्षण आज भी बरकरार है। राजसमंद जिले में कांकरोली की रामधुन गली स्थित नजरवाड़ी व्यायामशाला, जिसे शक्करकुड़ी अखाड़े के नाम से भी जाना जाता है, आधुनिकता के दौर में देसी व्यायाम और पारंपरिक कुश्ती की विरासत को सहेजे हुए है। श्री द्वारकाधीश मंदिर के समय से स्थापित बताया जाने वाला यह अखाड़ा पुरानी परंपराओं को जीवंत रखने की मिसाल है।

अखाड़े में आज भी पहलवान मिट्टी में उतरकर कुश्ती के दांव-पेच सीखते हैं और शारीरिक मजबूती के लिए पारंपरिक व्यायाम करते हैं। यहां नगर परिषद की ओर से आधुनिक व्यायाम मशीनें भी लगाई गई हैं, लेकिन हत्थी, मुगदल और रस्सों से अभ्यास करने की परंपरा भी जारी है। इस तरह अखाड़े में आधुनिक सुविधाओं और पारंपरिक व्यायाम पद्धति का अनूठा संगम देखने को मिलता है।

मिट्टी में कुश्ती के कई फायदे

मिट्टी के अखाड़े में कुश्ती करना केवल शारीरिक ताकत बढ़ाने का माध्यम नहीं, बल्कि संतुलन, फुर्ती और अनुशासन विकसित करने का भी अभ्यास है। कुश्ती के दौरान पहलवान को लगातार अपने शरीर का संतुलन बनाए रखना पड़ता है। इससे शरीर के विभिन्न मांसपेशी समूह सक्रिय होते हैं और ताकत के साथ सहनशक्ति विकसित करने में मदद मिलती है। दांव-पेच सीखने से फुर्ती, तालमेल और शरीर पर नियंत्रण बेहतर हो सकता है।

मिट्टी की सतह अपेक्षाकृत नरम होने के कारण गिरने के दौरान कठोर फर्श की तुलना में चोट का प्रभाव कुछ कम हो सकता है, हालांकि इससे चोट का खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता। साफ-सुथरी मिट्टी, नियमित सफाई और प्रशिक्षक की निगरानी अखाड़े में अभ्यास के लिए जरूरी हैं। पारंपरिक कुश्ती में शारीरिक मेहनत के साथ धैर्य, आत्मविश्वास और अनुशासन पर भी जोर दिया जाता है।

कभी मीठे पानी का स्रोत थी शक्करकुड़ी

इस अखाड़े की पहचान केवल कुश्ती तक सीमित नहीं है। यहां मौजूद प्राचीन कुई, जिसे शक्करकुड़ी कहा जाता है, पुराने समय में आसपास के लोगों के लिए मीठे पानी का स्रोत हुआ करती थी। इस लिहाज से यह स्थान व्यायाम और कुश्ती की परंपरा के साथ क्षेत्र की जल विरासत से भी जुड़ा हुआ है। शक्करकुड़ी की ऐतिहासिक पहचान इस जगह को खास बनाती है।

समिति संभाल रही व्यवस्था, कलारीपयट्टू का भी प्रशिक्षण

अखाड़े की व्यवस्थाएं संभालने के लिए गठित समिति में मनोज सनाढ्य, दिनेश माथुर, दिलीप ठाकुर, गोविन्द सिंह चारण, ललित साहू और चंद्रप्रकाश साहू सहित अन्य सदस्य सक्रिय हैं। गोविन्द सिंह चारण यहां प्राचीन भारतीय मार्शल आर्ट कलारीपयट्टू का प्रशिक्षण भी देते हैं।

मिट्टी की कुश्ती, देसी व्यायाम और पारंपरिक युद्धकला को सहेजता शक्करकुड़ी अखाड़ा बताता है कि बदलते दौर में भी परंपराओं की पहचान कायम रह सकती है। आधुनिक मशीनों के बीच यह अखाड़ा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने और पारंपरिक व्यायाम पद्धतियों को जानने का अवसर दे रहा है।