
रतलाम। ये सिर्फ पूर्व प्रधानमंत्री नहीं थे। ये नेता भी नहीं थे, ये तो मेरे लिए अब्बा जैसे थे। जब भी आते सबसे पहले परिवार के हाल जानते थे। कहते थे बेटियों को खुब पढ़ाना। जब उनको कचौरी खिलाता तो कहते, देख पंडित हूं, खुब खा जाउंगा, अब्दुल, फिर पंडित को बदनाम मत करना। ये कहना है रतलाम सर्किट हाउस के खानसामा अब्दुल का। अब्दुल उन कर्मचारियों में शामिल है, जिसने अटल जी की सेवा तब की, जब वे रतलाम आते थे।
जब अब्दुल को ये बताया गया कि अटल जी नहीं रहे तो उनको पहले तो भरोसा ही नहीं हुआ। बाद में धीरे से बोले भारत ही नहीं पाकिस्तान ने भी इनका लोहा माना था, लेकिन सबसे प्यारी कचौरी का नाम सुनते ही उनकी मुस्कान खिल जाती थी। सच बताया जाए तो वे रतलाम डिलक्स ट्रेन से आते और सुबह उठते ही कचौरी के बारे में सवाल करते थे।
जोर से आवाज लगाते हिम्मत सेव किधर है
राज्य वित्त आयोग अध्यक्ष हिम्मत कोठारी ने कि अटल जी भाषण बेहद उम्दा देते थे, लेकिन खाने के मामले में बेहद शर्मीले थे। वे खिलाने में तो भरोसा रखते थे, लेकिन उनको अगर कुछ मन हो तो बताते नहीं थे। कार्यकर्ताओं से ये पता चल गया था की उनको नमकीन पसंद है। ऐसे में वर्ष 1980-82 के बीच जब वे नीमच जाने के लिए रतलाम आए तो उनको नमकीन सेव पेश किया गया। उनको स्वाद इतना पसंद आया कि इसके बाद वे जब भी कभी आए, या आसपास से निकले तो सूचना आ जाती थी कि हिम्मत सेव कहां है। इसके बाद कोठारी उनको सेव उपलब्ध कराते थे।
इतना मत खिलाओ
नीमच से वापसी के दौरान जब रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतजार हो रहा था तो उनके लिए वीआईपी रूम खोल दिया गया, लेकिन वे जननेता की तरह आम यात्रियों के बीच बैठ गए। उन्होंने यात्रियों से देश के बारे मे काफी बात की। इसी बीच सर्किट हाउस में काम करने वाले अब्दुल उनके लिए गर्म-गर्म तेल से भरी हुई कचौरी लेकर आए। इस पर वे अब्दुल को बोले की पहले ही खूब खाना खिला दिया। इतना मत खिलाओ कि कोई ये कहे कि ये पंडित खूब खाता है। खा ता लूंगा, लेकिन बाद में ये कहकर बदनाम मत करना कि पंडित खाता खुब है। हालाकि तब भी उन्होंने स्वाद लेकर दो कचौरी खाई थी।