रतलाम

जैन मुनि प्रत्यक्ष रत्नविजय ने कहा- जीवन में अहिंसा, संयम और आत्मशांति ही जीवन की सच्ची दिशा

जैन मुनि ने युवाओं में तनाव, पर्यावरण, नशामुक्ति और मोक्ष तक हर विषय पर की जैन संत ने पत्रिका से खुलकर बात, बोले ऐसे दौर में जैन दर्शन मानव जीवन को नई दिशा देने का संदेश देता है।
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Aug 05, 2026
Pratyaksha Ratnavijay ratlam
Pratyaksha Ratnavijay ratlam

अंकित भंडारी

रतलाम। वर्तमान समय में बढ़ती हिंसा, भौतिकवाद, मानसिक तनाव, नशे की प्रवृत्ति और पर्यावरण संकट जैसे विषय पूरी दुनिया के सामने चुनौती बने हुए हैं। जैन मुनि प्रत्यक्ष रत्नविजय ने कहा कि यदि व्यक्ति अपने जीवन में अहिंसा, संयम, करुणा और आत्मचिंतन को स्थान दे दे, तो अधिकांश सामाजिक और व्यक्तिगत समस्याओं का समाधान स्वतः हो सकता है। पत्रिका से विशेष बातचीत में जैन मुनि प्रत्यक्षरत्नविजय से पत्रिका ने कई विषय पर लंबी बात की, प्रस्तुत है संपादित अंश।

पत्रिका : अहिंसा परमो धर्म के संदेश को आम आदमी अपने जीवन में कैसे उतार सकता है?

मुनि : अहिंसा केवल किसी की हत्या नहीं करने का नाम नहीं है, बल्कि मन, वचन और कर्म से किसी भी जीव को पीड़ा न पहुंचाना ही वास्तविक अहिंसा है। कटु वचन, क्रोध, ईर्ष्या, द्वेष और छल भी हिंसा के ही रूप हैं। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने व्यवहार में प्रेम, क्षमा और सहनशीलता अपनाए तो परिवार, समाज और राष्ट्र में शांति स्थापित हो सकती है। अहिंसा जीवन की सबसे बड़ी शक्ति है।

पत्रिका : युवाओं में अकेलापन और तनाव बहुत बढ़ रहा है, जैन दर्शन क्या रास्ता दिखाता है?

मुनि : तनाव का मूल कारण बाहरी उपलब्धियों में सुख ढूंढ़ना है। जैन दर्शन आत्मचिंतन, ध्यान, स्वाध्याय और संयम का मार्ग बताता है। जब मनुष्य स्वयं को पहचानता है, तब उसका मन स्थिर होता है। मोबाइल और आभासी दुनिया में खोने के बजाय परिवार, गुरु और अच्छे संस्कारों से जुड़ना चाहिए। आत्मबल बढ़ेगा तो तनाव स्वतः कम होगा।

पत्रिका : समाज में भौतिकवाद बढ़ रहा है, इस पर नियंत्रण कैसे पाया जाए?

मुनि : सुविधाएं आवश्यक हैं, लेकिन उनका गुलाम बन जाना उचित नहीं है। इच्छाएं जितनी बढ़ती हैं, अशांति भी उतनी ही बढ़ती है। जैन दर्शन 'अपरिग्रह' का संदेश देता है, अर्थात आवश्यकता भर ही संग्रह करना। संतोष सबसे बड़ा धन है। जिसने इच्छाओं पर नियंत्रण पा लिया, वही वास्तव में सुखी है।

पत्रिका : नशे से दूर रखने के लिए धार्मिक और नैतिक शिक्षा कितनी जरूरी है?

मुनि : नशा केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि विवेक और संस्कारों को भी नष्ट कर देता है। धार्मिक और नैतिक शिक्षा व्यक्ति में आत्मसंयम, जिम्मेदारी और सही-गलत की पहचान विकसित करती है। बचपन से यदि अच्छे संस्कार दिए जाएं तो युवा किसी भी प्रकार के व्यसन की ओर आकर्षित नहीं होंगे। समाज और परिवार दोनों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है।

पत्रिका : ग्लोबल वार्मिंग से बचने के लिए जैन दर्शन को कैसे लागू किया जाए?

मुनि : जैन दर्शन प्रत्येक जीव में आत्मा का वास मानता है। जब मनुष्य जीवों के प्रति दया और प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता रखेगा, तभी पर्यावरण सुरक्षित रहेगा। जल, जंगल और जमीन का संरक्षण, अनावश्यक उपभोग से बचना, पेड़ लगाना और जीवों की रक्षा करना केवल सामाजिक दायित्व नहीं बल्कि आध्यात्मिक साधना भी है। प्रकृति के साथ संतुलन ही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

पत्रिका : संत में मोक्ष की कामना होना सही है क्या?

मुनि : मोक्ष की भावना सांसारिक इच्छाओं जैसी नहीं होती। यह आत्मा की शुद्ध अवस्था प्राप्त करने की अभिलाषा है। सांसारिक इच्छाएं बंधन बढ़ाती हैं, जबकि मोक्ष की भावना सभी बंधनों से मुक्त होने का मार्ग है। जब साधक राग-द्वेष, मोह और अहंकार का त्याग करता है, तब वह आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। इसलिए मोक्ष की भावना त्याग और आत्मशुद्धि का सर्वोच्च लक्ष्य है, न कि भौतिक इच्छा।

पत्रिका : समाज को श्रैष्ठ कैसे बनाए?

मुनि :अहिंसा, संयम और करुणा से ही श्रेष्ठ समाज बनता है। आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता तकनीक की नहीं, बल्कि संस्कारों की है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अहिंसा, संयम, दया और आत्मानुशासन को अपनाए तो परिवार मजबूत होंगे, समाज में सद्भाव बढ़ेगा और विश्व शांति का मार्ग भी प्रशस्त होगा। जैन दर्शन केवल किसी एक समाज के लिए नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग है।

Updated on:
05 Aug 2026 12:42 pm
Published on:
05 Aug 2026 12:41 pm