। परिवार में किसी दिव्यांग के होने पर उससे पीछा छुड़ाने की पूरी कोशिश की जाती थी या वह घर में ऐसे रहता था,
एक वक्त था, जब दिव्यांग समाज में बिल्कुल अस्वीकार्य थे। परिवार में किसी दिव्यांग के होने पर उससे पीछा छुड़ाने की पूरी कोशिश की जाती थी या वह घर में ऐसे रहता था, जैसे हो ही नहीं। आज स्थिति काफी बदली है। समाज का एक बड़ा हिस्सा भले ही विकलांगों को अभी भी स्वीकार नहीं कर पा रहा है, लेकिन ऐसे भी कई उदाहरण हैं, जहां लोग रिश्ते और प्यार को विकलांगता और उससे उपजी परेशानियों से ऊपर रख रहे हैं।
स्वीकार कर रहा है समाज
कुछ दिन पहले कोलकाता में एक ऐसा ही उदाहरण देखने को मिला। सेरेब्रल पाल्सी से पीडि़त 27 वर्षीय सनत का आधार कार्ड न बनने से उसका बैंक खाता खुलने और दूसरी चीजों में दिक्कत आ रही थी। दिव्यांग होने के कारण उसका आधार कार्ड नहीं बन पा रहा था। उसकी मां नूपुर और बाकी परिवार ने हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दो साल आधार पाने की लड़ाई लड़ी। जब ईमेल पर नूपुर को सनत का आधार कार्ड मिला, तो वह दिन परिवार में जश्न की तरह मनाया गया। हर घर आने वाले का मुंह मीठा किया गया। अपने बेटे को जीवन का अधिकार और पहचान दिला कर सभी बहुत खुश थे। वहीं इंदौर के आदित्य ने पिछले साल डाउन्स सिंड्रोम से पीडि़त एक बच्चे बिन्नी को गोद लेकर उन सभी के लिए एक मिसाल कायम की, जो अपने ही परिवार के उन बच्चों या लोगों को बेसहारा छोड़ देते हैं, जिन्हें अपनों की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। एक संभ्रांत परिवार में पैदा हुए बिन्नी को बीमारी के कारण अनाथ छोड़ दिया गया था। उसके दिल में छेद है और दृष्टि भी स्पष्ट नहीं है। उसे गोद लेने के लिए आदित्य को काफी मशक्कत करनी पड़ी। अब वे देश के सबसे युवा गोद लेने वाले अभिभावक बन चुके हैं।
ज्यादा प्यार-देखभाल की जरूरत
कई बार जिम्मेदारी से बचने को लोग अपनों को सिर्फ इसलिए छोड़ देते हैं, क्योंकि वे दिव्यांग हैं या उनके साथ जानवरों जैसा व्यवहार करते हैं। जबकि उन्हें कहीं ज्यादा देखभाल की जरूरत है। परिवार ही उन्हें छोड़ देगा, तो रिश्तों का मतलब क्या है? रिश्ते तो निस्वार्थ होते हैं न?
भावनाओं का ख्याल रख कर पुकारें...
1995 में भारत मे निशक्तजन अधिनियम 1995 नामक कानून आया। विकलांगों ने इस आपत्ति जताते हुए कहा कि वे निशक्तजन की बजाय विकलांग जन कहलाना चाहते हैं। 2007 में भारत सरकार ने संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में द राइट्स ऑफ परसन्स विद डिसएबिलिटीज पर हस्ताक्षर किए।
बिना किसी अपेक्षा रखें ख्याल
अभिभावकों की अपने बच्चों के काफी अपेक्षाएं होती हैं। उन्हें पालते-पोसते और शिक्षा दिलाते वक्त उनके मन में होता है कि आगे चलकर वे उनका सहारा बनेंगे। दिव्यांग बच्चे बदले में कुछ नहीं दे सकते। इस कारण कई बार परिवारजन उन्हें छोड़ देते हैं। खासतौर पर आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों में दिव्यांग बच्चा बहुत बड़े बोझ के तौर पर देखा जाता है। सरकारी अभियान चल तो रहे हैं, पर वे जमीनी स्तर पर प्रभावी नहीं हो रहे। वो जागरूकता नहीं आ पा रही कि दिव्यांगों का ध्यान कैसे और क्यों रखना है। दिव्यांग बच्चे को अपने परिवार से बहुत ज्यादा लगाव और प्यार होता है, क्योंकि बाकी दुनिया में वे लगभग उपेक्षित रहते हैं। ऐेसे में सबसे बड़ी जिम्मेदारी परिवार की है। उन्हें अपेक्षाओं को परे रखना चाहिए। दिव्यांगों को एक बोझ नहीं, बल्कि जिम्मेदारी की तरह समझना चाहिए।
दिव्यांग बच्चा है परिवार में तो...
उसे जल्द-से-जल्द चिकित्सक को दिखाएं।
आर्थिक रूप से कमजोर होने पर दिव्यांगों के लिए काम करने वाले किसी एनजीओ या सरकारी संस्थान से मदद मांगें। आज ऐसे कई संस्थान मौजूद हैं।
जितनी जल्दी हो सके, उसकी वोकेशनल ट्रेनिंग शुरू करवा दें। इसके लिए एनजीओ और सरकारी संस्थानों की मदद लें।
यह कहें -
नेत्रहीन
मूक-बधिर
शारीरिक रूप से विकलांग
मानसिक रूप से विकलांग
यह मत कहें -
अंधा, सूरदास
गूंगा-बहरा
लूला और लंगड़ा
पागल और मंदबुद्धि