रिलेशनशिप

अपने बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए उनसे रिश्ता बनाएं स्ट्रॉन्ग

बदले हुए माहौल में स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर फिर से सोचने की जरूरत है

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Sep 15, 2017
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स्कूलों में दिन-ब-दिन बढ़ रही ऐसी घटनाओं से अभिभावकों के मन में यह डर बैठ रहा है कि क्या वे ‘जान की कीमत’ पर अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे हैं! बच्चे को स्कूल भेजने के बाद वे कैसे यह सोच लें कि उनके बच्चे स्कूल में सुरक्षित हैं? ऐसे में मां-बाप को क्या करना चाहिए कि उनके बच्चों को स्कूल भेजने के बाद वे सुरक्षा और चैन महसूस करें। एक रिपोर्ट...

गुरुग्राम के रायन इंटरनेशनल स्कूल के बाथरूम में एक ७ साल के मासूम की हत्या कर दी गई।
इसके ठीक दो दिनों बाद शाहदरा के एक स्कूल में पांच वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार हुआ।
सीकरी गांव में ७वीं कक्षा में पढऩे वाले छात्र के साथ पहले कुकर्म किया गया और फिर हत्या करके शव को दफना दिया गया।

क्या करें अभिभावक

बदले हुए माहौल में स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर फिर से सोचने की जरूरत है। मां-बाप अपने बच्चों को स्कूल में एक विश्वास के साथ छोड़ते हैं कि उनके बच्चे सुरक्षित हैं मगर जब दिल दहला देने वाली घटना सामने आती है तो प्रश्न उठता है क्या वाकई स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा की परवाह की जाती है? एक्सपर्ट की मानें तो मां बाप को बच्चों को स्कूल में दाखिल करवाकर चैन से नहीं बैठ जाना चाहिए। उन्हें समय-समय पर पता लगाते रहना चाहिए कि स्कूल में उनके बच्चे की स्थिति क्या है। कुछ बातों का ध्यान रखकर कुछ हद तक सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।

न छोड़ें अकेला

विशेषज्ञों के अनुसार जितना हो सके बच्चों को अकेला कहीं न भेजें। खेल का मैदान हो या फिर स्कूल पहुंचाने वाली गाड़ी हो। इन सारे पलों में शिक्षकों के साथ-साथ अभिभावकों की भागीदारी जरूरी है। अभिभावकों और विद्यालयों को मिलकर निगरानी बढ़ानी होगी। अभिभावकों को कुछ ज्यादा सतर्क होना होगा। बच्चों के साथ भागीदारी बढ़ानी होगी।

सर्वे के अनुसार

ब्रिटेन में इंटरनेट सुरक्षा फर्म ‘बुलगार्ड’ ने बच्चों की जासूसी और अभिभावकों की भूमिका पर सर्वे किया। इसमें १० से १७ आयुवर्ग के बच्चों वाले २००० अभिभावकों से सवाल पूछे गए। इसमें ६१ फीसद पैरेंट्स ने स्वीकार किया कि बच्चों के लैपटॉप, मोबाइल, सोशल साइट्स आदि की वे जासूसी करते हैं। माता-पिता के अनुसार उनके लिए जानना जरूरी है कि उनके बच्चे ऑनलाइन कैसे-कैसे लोगों से अपने विचार व्यक्त करते हैं।

ये बरतें सावधानियां

स्कूल बस के ड्राइवर और कंडक्टर का नंबर पास रखें। आजकल कई तरह के एप्लीकेशन आ गए हैं, जिससे आप अपने बच्चों को ट्रैक कर सकते हैं।
बच्चों को डर कर नहीं जीना चाहिए, लेकिन उन्हें ये जरूर समझाएं कि स्कूल में कहीं भी अकेले ना जाएं। हमेशा किसी के साथ रहें और जहां कहीं भी जाएं अपने दोस्तों और क्लास टीचर को जरूर बताएं।

कोशिश होनी चाहिए कि बच्चे का दाखिला उसी स्कूल में ही कराएं, जिसकी घर से दूरी २० से २५ मिनट से ज्यादा न हो। एडमिशन के समय ही यह भी सुनिश्चित कर लें कि स्कूल की सभी क्लासें, हॉल, लॉबी यहां तक कि गार्डन एरिया में भी कैमरे लगे हों और सभी कैमरे काम करते हों। ये बात आप एडमिशन के समय वहां के स्टाफ से पूछ भी सकते हैं।

यह भी जरूरी

स्कूल में कितने गार्ड हैं और कितनी नैनीज हैं।
बच्चा अगर स्कूल के बारे में कुछ कह रहा है तो उसे नजरअंदाज न करें। बात छोटी हो या बड़ी, संबंधित व्यक्ति से बात करें।
बच्चों को यह बताएं कि वो अपने माता-पिता और दादा-दादी और नाना-नानी के अलावा किसी अनजान पर भरोसा न करें। यदि बच्चे को कुछ अजीब लगता है तो वह अपनी क्लास टीचर और माता-पिता को जरूर बताए।
बच्चे के व्यवहार पर भी ध्यान रखें। अगर बच्चा आपसे कोई बात छुपा रहा है तो उससे बात करें और जानने की कोशिश करें कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। समय-समय पर बच्चे से स्कूल के बारे में जानकारी लेते रहें।

यदि बच्चा छोटा है

बच्चा अगर केजी या प्ले स्कूल में जा रहा है तो ध्यान दें कि उसे अपना पूरा नाम, आपका नाम, घर का पता और कम से कम दो फोन नंबर जरूर याद रहें। ये नंबर आपके अलावा किसी ऐसे करीबी के हों जो किसी भी अनजान नंबर से फोन आने पर उसे डिसकनेक्ट न करे।
कई पैरेंट्स बच्चे के कपड़ों या बैगपैक पर उसका नाम या पता लगा देते हैं। ऐसा करने से बचें क्योंकि इससे किसी भी अनजान व्यक्ति को आपके बच्चे की डिटेल्स पता चल जाती है। ऐसे में नाम लेकर छोटे बच्चे को बहकाना आसान हो जाता है।

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों की मानें तो साल २०१५ में देशभर में बच्चों के खिलाफ क्राइम के ९४,१७२ मामले हुए, जिसमें सबसे ज्यादा ११,४२० मामले उत्तर प्रदेश में रजिस्टर किए गए। वहीं साल २०१४ से तुलना करें तो बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराध के मामलों में १२.९ फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। स्कूल में बढ़ती असुरक्षा को देखते हुए मनोचिकित्सव डॉ. नियति दीवान कहती हैं- स्कूल में बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जितनी स्कूल पर है, उतनी ही माता-पिता पर भी है। स्कूल के बारे में छानबीन करके ही बच्चे को वहां दाखिल कराएं।

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