बार बार सेल्फी लेना, सोशल नेटवर्क पर तो एक्टिव रहने से इंसान खुद को परिवार से अलग करता है, जिसे आज कल ‘सेल्फाइटिस’ कहा जाता है।
सोशल मीडिया पर एक्टिव रहना अच्छी बात है। लेकिन पूरे समय इसके साथ लगे रहने से अनजाने में फीड और नोटिफिकेशन के गुलाम बन जाते है। इस एडिशन से त्वचा भी समय से पहले बूढ़ी हो रही है। और दिमाग भी फिट नहीं रह पा रहा। कुछ लोग मोबाइल पास न होने या फिर उसपर सही नेटवर्क न आने से परेशान हो जाते हैं। वहीं सेल्फी की वजह नई बीमारी लोगों को अपना शिकार बना रही है, जिसका नाम है सेल्फी एल्बो।
दरअसल बार-बार अपने मोबाइल से सेल्फी लेने के चकर में हम ये भूल जाते है कि हमारे हाथ और खास तौर पर कोहनी पर इससे जोर पड़ता है। इसलिए अगर हम सेल्फी लेने का सिलसिला लंबे समय तक जारी रखते है तो कुछ समय बाद हमारी कोहनी में दर्द शुरू हो जाता है जिसे सेल्फी एल्बो का नाम दिया गया है। बार बार सेल्फी लेना, सोशल नेटवर्क पर तो एक्टिव रहने से इंसान खुद को परिवार से अलग करता है, जिसे आज कल ‘सेल्फाइटिस’ कहा जाता है।
नोमोफोबिया के शिकार तो नहीं? ज्यादातर समय कंप्यूटर और मोबाइल पर बीतने से आंखों के किनारों पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। डार्क सर्कल भी हो सकते है।
मोबाइल फोन पर आपकी टॉयलेट सीट की तुलना में 10 गुना ज्यादा बैटीरिया होते हैं। आप जब फोन कान से लगाते हैं, तो ये बैटीरिया आपके चेहरे पर स्थानांतरित हो जाते हैं, जिससे मुहांसे की प्रॉलम होने लगती है।
मोबाइल फोन की तेज रोशनी हमारे स्लीप पैटर्न को बिगाड़ती है। असर सोने जाते वक्त मोबाइल पर व्हाट्स ऐप या दूसरे मैसेज चैक करते हैं। इससे हमारे शरीर में मेलाटोनिन बनता है, जिससे नींद डिस्टर्ब हो जाती है और हम सो नहीं पाते।
फोन घर पर भूलने पर कुछ लोग पैनिक हो जाते हैं। मोबाइल के न होने पर उत्पन्न होने वाला डर नोमोफोबिया कहलाता है। इसका त्वचा पर असर पड़ता है, प्रीमेच्योर एंजिग भी हो सकता है।