
Jhulelal Chaliha Mahotsav: सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल का 40 दिवसीय चालीहा महोत्सव बुधवार, 16 जुलाई से शुरू होकर 25 अगस्त तक श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया जाएगा। इस दौरान झूलेलाल मंदिरों में विशेष पूजा-अर्चना, हवन, महाआरती, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों की श्रृंखला चलेगी।
सिंधी समाज के आराध्य भगवान झूलेलाल की आराधना के लिए मनाया जाने वाला चालीहा महोत्सव 40 दिन की तपस्या, संयम और भक्ति का विशेष पर्व है। मान्यता है कि 11वीं शताब्दी में सिंध के लोगों ने अत्याचारों से परेशान होकर 40 दिनों तक नदी किनारे उपवास कर भगवान झूलेलाल की आराधना की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने अवतार लेकर अत्याचारों से मुक्ति दिलाई थी। इसी स्मृति में समाज हर वर्ष यह पर्व श्रद्धा के साथ मनाता है। श्रद्धालु इस अवधि में भगवान झूलेलाल की उपासना कर सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
सिंधु प्रांत में आज से करीब एक हजार साल पहले मिरख बादशाह के अत्याचारों से तंग आकर श्रद्धालुओं ने सिंधु नदी के किनारे 40 दिनों तक भगवान वरुण की प्रार्थना की थी। इस दौरान नदी से ही एक विशिष्ट बालक के अवतरित होने की आकाशवाणी हुई थी और चालीसवें दिन भगवान वरुण प्रकट हुए थे। इन्होंने आगे चलकर एक नए स्वरूप मे मिरख बादशाह के अत्याचार को नष्ट किया था और अपने अनुयायियों को खुशहाली प्रदान की थी। श्रद्धालुओं की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान वरुण देवता मछली पर सवार होकर सिंधु नदी में प्रकट हुए थे।
इस दौरान वरुण देवता ने कहा कि चिंता न करो मैं बहुत जल्द रतन राय के घर जन्म लूंगा और तुम्हारे दुखों का अंत करूंगा। सन 991 में सिंध प्रांत के नसरपुर नगर में रतन राय के घर चैत्र शुक्ल तृतीया को एक बालक का जन्म हुआ। उनका नाम उदय चंद रखा गया। बड़े होने पर वह घोड़े पर सवार होकर मिरख बादशाह के पास गए। उसे समझाया लेकिन, फौज और धन के घमंड में वह नहीं समझा। अंततः उदय चंद ने उसका वध कर दिया, जिससे सिंधी समाज के लोगों की सारी पीड़ा दूर हो गई। इसी उपलक्ष्य में सिंधी समाज 16 जुलाई से 24 अगस्त तक चालीहा महोत्सव मनाता है।