धर्म और अध्यात्म

Phalgun Kanvar Yatra: साल में कितनी बार होती है कांवड़ यात्रा, जानें इतिहास

Kanvar Yatra का नाम आते ही जहन में सावन महीने का खयाल आता होगा। लेकिन हम आपको बता दें कि शिव भक्त साल में एक बार नहीं, दो बार कांवड़ यात्रा (Kanwar Yatra History) निकालते हैं। एक सावन महीने में और दूसरा फाल्गुन महीने में, इस दौरान शिव भक्त किसी तीर्थ स्थल से गंगा जल लाकर सावन में शिवरात्रि और फाल्गुन में महाशिवरात्रि (Mahashivratri) पर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं और पूजा अर्चना करते हैं।

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Feb 07, 2023
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Phalgun Kanwar Yatra 2023

Phalgun Kanwar Yatra: फाल्गुन कांवड़ यात्रा की 6 फरवरी से शुरुआत हो गई है, महाशिवरात्रि पर भक्त जल लाकर शिवालयों में जलाभिषेक करेंगे। इसको लेकर पश्चिमी यूपी, हरियाणा, दिल्ली आदि इलाकों से कांवड़िये हरिद्वार में हरकी पौड़ी, ब्रह्मकुंड की ओर निकलने लगे हैं, वहीं पूर्वी यूपी, बिहार, झारखंड, प. बंगाल आदि की ओर के लोग सुल्तानगंज की ओर जा रहे हैं। पूर्वी हिस्से के लोग सुल्तानगंज में जल भरकर बाबा वैद्यनाथ का जलाभिषेक करेंगे तो प. बंगाल के भक्त तारकनाथ का अभिषेक करेंगे। कुछ लोग अपने आसपास के पवित्र शिवालयों में भी जलाभिषेक करेंगे।

कांवड़ यात्रा का महत्वः फाल्गुन में भक्त बांस की लकड़ी के दोनों तरफ बंधी दो टोकरियां लेकर यात्रा पर निकलते हैं, इसी को कांवड़ कहते हैं और कांवड़ संग यात्रा करने वाले इन भक्तों को कांवड़िया कहा जाता है। ये कांवड़िये कांवड़ को कंधे पर रखकर पैदल बोल बम का जयघोष करते हुए जल लेने जाते हैं। भक्त कांवड़ में बंधे डिब्बों में जल लेकर आते हैं और जलाभिषेक करते हैं। कांवड़ यात्रा के दौरान भी यह जमीन पर नहीं रखी जाती, दैनिक क्रियाओं के दौरान या तो कांवड़ दूसरे साथी के कंधे पर रख दी जाती है या किसी पेड़ से टांग दी जाती है।


मान्यता है कि कांवड़ यात्रा निकालकर पवित्र स्थानों से गंगाजल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करने से महादेव प्रसन्न होते हैं और भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं। मान्यता है कांवड़ यात्रा से भक्त के पापों का नाश हो जाता है। वह जीवन मरण के चक्र से छूट जाता है और मृत्यु बाद शिवलोक की प्राप्ति करता है। यह भी कहा जाता है कि इससे हर कदम के साथ एक अश्वमेध यज्ञ के बराबर फल मिलता है। अब कुछ लोग वाहनों से भी कांवड़ लेकर चलते हैं, लेकिन एक निश्चित दूरी तक वो भी कांवड़ को कांधे पर रखकर पैदल चलते हैं।

कांवड़ यात्रा का इतिहासः कांवड़ यात्रा का इतिहास सदियों पुराना है, लेकिन पहले साधु, मारवाड़ी व्यापारी और संपन्न वर्ग के कम लोग कांवड़ यात्रा करते थे। 1960 के आसपास तक ये लोग हरिद्वार या सुल्तानगंज जाते थे और जल लेकर लौटकर भगवान का जलाभिषेक करते थे। हालांकि अब कांवड़ यात्रा उत्सवी रंग ले रहा है, हिंदू समाज के सभी समुदायों के लोग उत्साह के साथ कांवड़ यात्रा निकालते हैं और जल लाकर आराध्य शिव का जलाभिषेक करते हैं।

अब तो विदेशों में भी हिंदू समाज के लोग कांवड़ यात्रा निकालते हैं। अंग्रेज लेखकों की पुस्तकों में भी 19 वीं शती में कांवड़ यात्रा का उल्लेख मिलता है, लेकिन तब इसमें तामझाम नहीं होता था। 80 के दशक के बाद से ये बड़े धार्मिक आयोजन में बदलने लगा।


कहा जाता है कि पहले कांवड़िये भगवान परशुराम थे, भगवान शिव के परम भक्त और विष्णु के अवतार भगवान परशुराम ने गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लेकर बागपत में पुरा महादेव मंदिर में शिव का गंगाजल से अभिषेक किया था। हालांकि कुछ धार्मिक ग्रंथों में पहला कांवड़िया रावण को माना गया है। इसके अनुसार कांवड़ यात्रा की परंपरा सागर मंथन से ही पड़ गई थी।

इनके अनुसार सागर मंथन से कालकूट विष निकला तो सृष्टि में त्राहिमाम मच गया, भगवान शिव ने इसे गले में धारण कर सृष्टि की रक्षा की। लेकिन इससे शिव के भीतर नकारात्मक ऊर्जा ने जगह बना ली थी, बाद में रावण ने गंगा जल से पुरा महादेव मंदिर में शिव का अभिषेक किया, फिर शिव इस नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त हुए।