Premanand ji Maharaj Pravachan on Pooja: घर में की गई उपासना और पवित्र धामों या मंदिरों में किए गए भजन में पुण्य का बड़ा अंतर होता है। इस लेख में प्रेमानंद जी से समझिए, कहां पूजा करना सबसे ज्यादा लाभ देता है।
Premanand ji Maharaj Pravachan on Pooja: प्रेमानंद जी महाराज ने मंदिर और घर की पूजा में महत्वपूर्ण अंतर बताया है। उन्होंने कहा कि, जिस ध्यान, जप का फायदा घर पर एक गुना मिलता है; उसी जप को यदि मंदिर और तीर्थ स्थानों में किया जाए, तो फल कई गुना मिलता है। विस्तार से समझते हैं, महाराज श्री ने इस विषय पर क्या कुछ कहा।
महाराज जी कहते हैं कि, घर पर और मंदिर जाकर पूजा करने में बहुत अंतर होता है। पूजा का फल स्थान की पवित्रता और वहां की ऊर्जा पर बहुत निर्भर करता है। प्रेमानंद जी महाराज के इन वचनों को समझकर आप जीवन बेहतर बना सकते हैं। उनकी वाणी शास्त्रों पर आधारित होती है। ऐसे में हर वर्ग के लोग उनसे जुड़ाव महसूस करते हैं।
महाराज श्री के अनुसार, भक्ति मार्ग में स्थान बहुत मायने रखता है। यदि आप, घर में बैठकर भगवान के नाम की एक हजार माला जपते हैं, तो उसका अपना फल है। वही जप यदि आप किसी गौशाला में जाकर करते हैं, तो मात्र सौ माला का फल भी घर की हजार माला के बराबर मिलता है। वहीं किसी मंदिर में जाकर प्रभु के सामने बैठ केवल एक माला जपते हैं, तो उसका पुण्य घर में की गई हजार माला के बराबर माना जाता है।
यदि ब्रजभूमि या वृंदावन जैसे पवित्र धामों की बात करें, तो वहां की महिमा और भी बढ़ जाती है। मान्यता है कि, वृंदावन धाम में बैठकर की गई एक माला का जाप, सामान्य स्थान पर की गई एक लाख माला के बराबर फल देने वाला होता है। इसी तरह गंगा, यमुना, क्षिप्रा या नर्मदा जैसी पवित्र नदियों के तट पर किया गया भजन अनंत गुना फल देता है।
संत श्री कहते हैं कि, भजन का तरीका भी पुण्य फल को डिसाइड करने में अहम रोल निभाता है। यदि कोई साधक गंगा जल में खड़े होकर या गले तक जल में डूबकर भगवान का ध्यान करता है, तो उसकी एकाग्रता और तपस्या का स्तर बहुत बढ़ जाता है। ऐसे में इससे मिलने वाला लाभ भी कई गुना होता है।
वैसे तो, भगवान कण-कण में व्याप्त हैं। सच्ची श्रद्धा से घर में भी प्रकट हो सकते हैं, लेकिन तीर्थों और पवित्र स्थानों की ऊर्जा हमारे मन को जल्दी शांत करती है और साधना को गहराई देती है। इसलिए, सांसारिक भागदौड़ से समय निकालकर कभी-कभी पवित्र धामों, नदियों के तट या गौशालाओं में जाकर प्रभु का स्मरण अवश्य करना चाहिए। भगवान भाव के भूखे होते हैं किसी पदार्थ या वस्तु के नहीं। ऐसे में भाव को ही प्रधान मानकर हर स्थान पर पुण्य कर्म करना चाहिए। रामचरितमानस के सुंदरकांड में बाबा तुलसी ने भी भगवान के पाने वाले प्रियजनों की यही खासियत समझाई है...
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा।।