धर्म और अध्यात्म

Vishnu Chalisa: पुत्रदा एकादशी पर पढ़ें यह विष्णु चालीसा, भगवान प्रसन्न होकर देते हैं वरदान

एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा अर्चना की जाती है। इसके लिए भक्त मंत्र, स्तुति और चालीसा पाठ कर भगवान का ध्यान करते हैं। पुजारियों का कहना है कि यदि भक्त एकादशी पर भगवान विष्णु के चालीसा का पाठ करे तो भगवान शीघ्र प्रसन्न हो जाते हैं और भक्त का दुख दर्द दूर कर उसे मनचाहा वरदान देते हैं।

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Aug 26, 2023
पुत्रदा एकादशी पर विष्णु चालीसा का पाठ

विष्णु चालीसा पाठ का महत्व


पुजारियों का कहना है कि श्री विष्णु चालीसा में भगवान विष्णु की इस तरह की स्तुति की गई है कि इससे भगवान शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। एकादशी ही नहीं गुरुवार की पूजा में भी इसका पाठ जरूर करना चाहिए। विष्णु चालीसा के पाठ से सुख समृद्धि में वृद्धि होती है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार जो लोग नियमित विष्णु चालीसा का पाठ करते हैं, उनके घर में खुशियों का बसेरा रहता है। इसलिए हम आपके लिए पेश कर रहे हैं विष्णु चालीसा हिंदी लिरिक्स, जिससे आप भगवान का ध्यान कर उन्हें प्रसन्न कर सकते हैं। 16 अगस्त को पुत्रदा एकादशी पर हम आपके लिए लाएं हैं संपूर्ण विष्णु चालीसा..

दोहा


विष्णु सुनिए विनय सेवक की चितलाय ।
कीरत कुछ वर्णन करूं दीजै ज्ञान बताय ॥

 

विष्णु चालीसा चौपाई


नमो विष्णु भगवान खरारी, कष्ट नशावन अखिल बिहारी ।
प्रबल जगत में शक्ति तुम्हारी, त्रिभुवन फैल रही उजियारी ॥

सुन्दर रूप मनोहर सूरत, सरल स्वभाव मोहनी मूरत ।
तन पर पीताम्बर अति सोहत, बैजन्ती माला मन मोहत ॥

शंख चक्र कर गदा विराजे, देखत दैत्य असुर दल भाजे ।
सत्य धर्म मद लोभ न गाजे, काम क्रोध मद लोभ न छाजे ॥

सन्तभक्त सज्जन मनरंजन, दनुज असुर दुष्टन दल गंजन ।
सुख उपजाय कष्ट सब भंजन, दोष मिटाय करत जन सज्जन ॥
पाप काट भव सिन्धु उतारण, कष्ट नाशकर भक्त उबारण ।
करत अनेक रूप प्रभु धारण, केवल आप भक्ति के कारण ॥

धरणि धेनु बन तुमहिं पुकारा, तब तुम रूप राम का धारा ।
भार उतार असुर दल मारा, रावण आदिक को संहारा ॥

आप वाराह रूप बनाया, हिरण्याक्ष को मार गिराया ।
धर मत्स्य तन सिन्धु बनाया, चौदह रतनन को निकलाया ॥

अमिलख असुरन द्वन्द मचाया, रूप मोहनी आप दिखाया ।
देवन को अमृत पान कराया, असुरन को छवि से बहलाया ॥
कूर्म रूप धर सिन्धु मझाया, मन्द्राचल गिरि तुरत उठाया ।
शंकर का तुम फन्द छुड़ाया, भस्मासुर को रूप दिखाया ॥

वेदन को जब असुर डुबाया, कर प्रबन्ध उन्हें ढुढवाया ।
मोहित बनकर खलहि नचाया, उसही कर से भस्म कराया ॥

असुर जलन्धर अति बलदाई, शंकर से उन कीन्ह लड़ाई ।
हार पार शिव सकल बनाई, कीन सती से छल खल जाई ॥

सुमिरन कीन तुम्हें शिवरानी, बतलाई सब विपत कहानी ।
तब तुम बने मुनीश्वर ज्ञानी, वृन्दा की सब सुरति भुलानी ॥

देखत तीन दनुज शैतानी, वृन्दा आय तुम्हें लपटानी ।
हो स्पर्श धर्म क्षति मानी, हना असुर उर शिव शैतानी ॥

तुमने ध्रुव प्रहलाद उबारे, हिरणाकुश आदिक खल मारे ।
गणिका और अजामिल तारे, बहुत भक्त भव सिन्धु उतारे ॥
हरहु सकल संताप हमारे, कृपा करहु हरि सिरजन हारे ।
देखहुं मैं निज दरश तुम्हारे, दीन बन्धु भक्तन हितकारे ॥

चाहता आपका सेवक दर्शन, करहु दया अपनी मधुसूदन ।
जानूं नहीं योग्य जब पूजन, होय यज्ञ स्तुति अनुमोदन ॥

शीलदया सन्तोष सुलक्षण, विदित नहीं व्रतबोध विलक्षण ।
करहुं आपका किस विधि पूजन, कुमति विलोक होत दुख भीषण ॥

करहुं प्रणाम कौन विधिसुमिरण, कौन भांति मैं करहु समर्पण ।
सुर मुनि करत सदा सेवकाई, हर्षित रहत परम गति पाई ॥

दीन दुखिन पर सदा सहाई, निज जन जान लेव अपनाई ।
पाप दोष संताप नशाओ, भव बन्धन से मुक्त कराओ ॥

सुत सम्पति दे सुख उपजाओ, निज चरनन का दास बनाओ ।
निगम सदा ये विनय सुनावै, पढ़ै सुनै सो जन सुख पावै ॥

॥ इति श्री विष्णु चालीसा ॥

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