धर्म

दादू के शागिर्द रजब अली आखिरी सांस तक बने रहे दूल्हा

दादू के ब्रह्मलीन होने के बाद उत्तराधिकारी बने संत गरीबदास ने रजब को दूल्हे की वेशभूषा छोडऩे की सलाह दी लेकिन उन्होंने अपनी पोशाक नहीं उतारी
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Updated: 9 Oct 2017, 1:51 PM IST
dadu dayal
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- जितेन्द्र सिंह शेखावत

आमेर नरेश मानसिंह प्रथम के गुरु संत दादूदयालजी के शागिर्द बने रजब अली खां अंतिम समय तक दूल्हे की पोशाक पहने ही भक्ति करते रहे। सांगानेर निवासी रजब की सगाई आमेर के पठान खानदान में हुई थी। विवाह के लिए रजब बारात सजाकर आमेर आए थे। विवाह से पहले रजब दूल्हे की पोशाक शेरवानी में मित्रों के साथ मावठा सागर आश्रम में दादूजी से मिलने गए। दादूजी की समाधि टूटी तब रजब ने दादूजी को प्रणाम किया। दूल्हे की पोशाक में रजब को दादूजी ने स्नेह भरी निगाह से देखा।

दादूवाणी का उपदेश सुनने के बाद रजब को वैराग्य हो गया। रजब ने सांसारिक मोह माया छोड़ विवाह करने का विचार छोड़ दिया। रजब दूल्हे की पोशाक उतारने लगे, तब दादू ने कहा कि दूल्हे की वेशभूषा में ही सत्य को ढूंढकर वैराग्य पाया है, इसलिए इस शेरवानी को मत उतारना। दादू की सीख के बाद रजब अंत समय तक दूल्हे की पोशाक में रहे। उनकी शेरवानी पुरानी हो फटने लगती तब कोई शिष्य उनको नई पोशाक सिलवा देता।

दादू के ब्रह्मलीन होने के बाद उत्तराधिकारी बने संत गरीबदास ने रजब को दूल्हे की वेशभूषा छोडऩे की सलाह दी लेकिन उन्होंने अपनी पोशाक नहीं उतारी। करीब १२२ साल की उम्र तक भक्ति की धारा में डूबे रहे रजब ने काशी आदि तीर्थों की यात्रा भी की। इतिहासकार आनन्द शर्मा के मुताबिक रजब बचपन से ही सांगानेर में आने वाले संतों की संगति में रहने लगे थे। संत दादूजी की सिद्धियों और चमत्कारों के बारे में रजब ने संतों से बहुत कुछ सुना। बीस साल के रजब अली ने दादूजी से पहली मुलाकात में ही उनको गुरु मान लिया।

बादशाह अकबर के बुलावे पर फतेहपुर सीकरी गए दादूजी आमेर वापस आए तब रजब ने उनसे गुरु दीक्षा ली। दादूवाणी की रजब वाणी को उनके शिष्यों में गोविंददास, खेमदास, हरीदास, छीतर, जगन, दामोदरदास, केशवदास, कल्याण, बनवारीदास आदि ने पूरे ढूढाड़ में फैलाया। रजब के सम्मान में दादू आदि संतों ने दोहे लिखे। संत मोहन दास ने लिखा कि रजब के चरण छूने से ही पाप का पर्वत नष्ट हो जाता है। रजब के दोहों की भाषा कबीर वाणी की तरह सरल व मन को छूने वाली है। राम स्नेही महात्मा राम चरण दास ने रजब के बारे में यह दोहा लिखा।

- दादू जैसा गुरु मिले,
शिष्य रजब सा जाण।
एक शब्द मै उधड़ गया
रही नहीं खैंचा ताण।