Shankracharya Avimukteshwaranand Controversy: शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद विवाद के बीच उनकी नियुक्ति का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। इस लेख में विस्तार से समझिए, अविमुक्तेश्वरानंद का शंकराचार्य बनना विवादित क्यों रहा है? क्यों यह मामला कोर्ट में लंबित है? शंकराचार्य बनने की शर्ते क्या हैं? उनके ABVP से कनेक्शन क्या थे और राहुल गांधी को उन्होंने सनातन से बेदखल क्यों किया।
Shankracharya Avimukteshwaranand Controversy: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। ज्योतिष पीठ (ज्योतिर्मठ/जोशीमठ) का शंकराचार्य पद का मामला बीते कुछ सालों से अदालती गलियारों और संत समागमों में चर्चा का केंद्र बना हुआ है। इसी बीच समझिए, सनातन धर्म में सर्वोच्च पद माने जाने वाले शंकराचार्य पद पर कोई कैसे नियुक्त होता है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद शंकराचार्य कैसे बने, इस पर बवाल क्यों मचा था और उनके गुरु कौन थे? साथ ही शंकराचार्य के ABVP से कनेक्शन और राहुल गांधी को सनातन से बेदखल करने की पूरी इनसाइड स्टोरी।
जानकारी के मुताबिक, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने लगभग 22 वर्षों तक अपने गुरु की सेवा की। उनकी नियुक्ति के मुख्य रूप से दो आधार रहे:
अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य बनने पर इन कारणों से विवाद खड़ा हुआ...खबरों के अनुसार,
शंकराचार्यों की नियुक्ति शंकराचार्य जी द्वारा रचित मठाम्नाय अनुशासन (महानुशासन) के नियमों के अनुसार होती है।
उपलब्ध जानकारियों के अनुसार, स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती थे, जिन्हें क्रांतिकारी साधु कहा जाता था। वे द्वारका शारदा पीठ और ज्योतिषपीठ, दोनों के शंकराचार्य रहे। स्वरुपानंद जी ने स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लिया और राम मंदिर आंदोलन में भी बढ़-चढ़कर योगदान दिया। सितंबर 2022 में उनके ब्रह्मलीन होने के बाद उनके दो प्रमुख शिष्यों को उत्तराधिकारी चुना गया: स्वामी सदानंद सरस्वती (द्वारका पीठ) और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद (ज्योतिषपीठ)।
शंकराचार्य ने संसद में राहुल गांधी के भाषण का पहले बचाव किया था, लेकिन बाद में मनुस्मृति का अपमान करने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी को हिंदू धर्म से निष्कासित करने की घोषणा कर दी। यह विवाद भी काफी चर्चा में रहा था।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद पर कुछ लोग भाजपा विरोधी होने का आरोप लगाते हैं, लेकिन उनका अतीत हिंदुत्व की राजनीति से गहराई से जुड़ा है। खबरों के अनुसार, उत्तरप्रदेश के प्रतापगढ़ में जन्मे उमाशंकर उपाध्याय (स्वामी जी का बचपन का नाम) बनारस में पढ़ाई के दौरान ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) के सक्रिय सदस्य रहे। उन्होंने 1994 में ABVP के समर्थन से छात्र संघ चुनाव में भी जीत हासिल की। यहां तक की शंकराचार्य साल 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए भी खुला समर्थन दे चुके हैं। हालांकि बाद में, गोवंश संरक्षण के मुद्दे पर वे केंद्र सरकार के आलोचक के रूप में सामने आए।
अभी चल रहा अविमुक्तेश्वरानंद विवाद 18 जनवरी को मौनी अमावस्या के दिन शुरु हुआ। जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी प्रयागराज के माघ मेले में पालकी से स्नान करने के लिए जा रहे थे। इसी दौरान, पुलिस ने उन्हें स्नान करने से रोक दिया।प्रशासन का कहना है कि नियम है, कोई भी पालकी से गंगा के संगम तक स्नान करने नहीं जा सकता। शंकराचार्य ने नियमों का उल्लंघन किया, इसीलिए उन्हें स्नान से रोका गया। तभी से स्वामी जी उनके शिष्यों के साथ शिविर के बाहर धरने पर बैठे हैं। अब सरकार, प्रशासन और शंकराचार्य जी में ठनी हुई है। विवाद थमने की बजाय, शंकराचार्य के शिविर में घुसकर नारेबाजी होने और प्रशासन के दो नोटिसों के बाद से और बढ़ गया है। इसी बीच, ज्यादातर लोग सोशल मीडिया पर अविमुक्तेश्वरानंद के सपोर्ट और शासन-प्रशासन के विरोध में पोस्ट और कॉमेंट्स कर रहे हैं। हालांकि, कुछ यूजर्स शंकराचार्य के खिलाफ भी लिख रहे हैं।
छविः प्रशासन का शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद को नोटिस