बांग्लादेश के नोआखाली में जन्मे, इंडियन आर्मी में रहे, सेवानिवृत्त के बाद कर रहे मरीजों की नि:शुल्क सेवा
रीवा में एक ऐसा डॉक्टर मौजूद है जिसने पहले देश के लिए, फिर मरीजों की सेवा में जीवन समर्पित कर दिया। क्लीनिक भले निजी थी पर कभी भी मरीजों से इलाज की फीस नहीं ली। निर्धन,असहायों को मुफ्त में दवा करते रहे। उनके इस उपकार को मरीज सम्मान देते ही हैं, चिकित्सा जगत भी उन्हें हाथोंहाथ लेता है। बात कर रहे हैं अमहिया रोड पर एक छोटे से मकान में रहने वाले डॉ. केपी सूर की...।
रीवा। जिंदगी के 103 बसंत देख चुके डॉ. केपी सूर ने पत्रिका से बातचीत में अपनी जिंदगी के कुछ लम्हें साझा किए। बताया कि आजादी के पहले वह (नोआखाली बांग्लादेश) में रहते थे। ढाका से 1942 में एलएलएमपी का मेडिकल कोर्स किया था जिसके बाद 1947 में ब्रिटिश आर्मी में सेलेक्ट हो गए थे। देश आजाद हुआ तो ब्रिटिश आर्मी से इंडियन आर्मी में स्थानांतरण हो गया। तब उन्हें पोस्टिंग आम्र्ड फोर्स मेडिकल कॉलेज पूना में मिली। करीब 20 साल की नौकरी में लखनऊ, बनारस, रांची में भी रहे। नौकरी के दौरान ही बनारस की रहने वाले गीता सूर जीवनसंगिनी बनी। चार बेटों के पिता बने। खुशियों से घर-आंगन महक ही रहा था कि पत्नी अनजानी बीमारी से ग्रस्त हो गईं। एक दिन उपचार के दौरान पत्नी ने हमेशा के लिए साथ छोड़ दिया। जिंदगी के आधे सफर में गमों की परछाई पड़ी लेकिन हिम्मत नहीं हारी। रीवा में परिवार के लोग रहते थे। एएफएमसी पूना से 1967 में सेवानिवृत्त होने के बाद वह रीवा में आकर हमेशा के लिए बस गए।
पत्नी की याद में खोली नि:शुल्क क्लीनिक
अमहिया रोड किनारे मकान बनाया। पत्नी के यादें सताती थीं, इसलिए मकान में ही गीता मेमोरियल क्लीनिक खोली और नि:शुल्क मरीजों की सेवा का संकल्प लिया। रीवा, सतना, सीधी, सिंगरौली से बड़ी संख्या में मरीज आते थे। कभी किसी से फीस नहीं ली। निर्धन, असहाय लोग आते थे दवा के पैसे नहीं होते थे तो उन्हें दवा भी मुफ्त देते थे। मरीज आते थे, दो-दो दिन रुक ते थे। घर पर ही भोजन बनता था। डॉ. केपी सूर कहते हैं कि उन्हें खुशी है कि संकल्प को पूरा करने में सफल रहा। सबसे ज्यादा पेट दर्द के रोगी आते थे, बुखार, सर्दी, जुकाम, सिरदर्द सहित अन्य बीमारियों का इलाज करते रहे। महसांव में भी एक क्लीनिक कई सालों तक चलाई।
चार बेटे, सभी ने पूरी की पिता की इच्छा
डॉ. केपी सूर के चार बेटे हैं। जो अपने पिता की उम्मीदों पर खरे उतरें। बेटा सपन सूर रेलवे में इंजीनियर, तपन सूर मेडिकल क्षेत्र की बड़ी दवा कंपनी में मैनेजर, पवन सूर बाणसागर के अधिकारी और अंजन सूर कर्नल। एक पिता के लिए इससे बड़ी खुशी की सौगात और क्या होगी। इससे भी बड़ी बात ये कि डॉ. केपी सूर अपने बेटों को सेवानिवृत्त होते हुए भी देख चुके हैं। डॉ. सूर के सभी बेटे बाहर रहते हैं लेकिन उन्होंने अपना मकान नहीं छोड़ा। यहां पड़ोसी संतोष गुप्ता का परिवार सेवा करता है। उनकी बेटी छाया उनकी दुलारी है। डॉ. सूर का सपना है कि वह भी डॉक्टर बने। डॉ. सूर ने अपनी परिवार की इच्छा से मेडिकल कॉलेज रीवा को देहदान का संकल्प पत्र भी भर दिया है।
डॉ. सूर के पंसदीदा डॉक्टर
रीवा मेडिकल क्षेत्र में पूरे संभाग में अग्रणी रहा है। कई अच्छे डॉक्टर यहां हुए। जिनमें से डॉ. सूर के पंसदीदा डॉक्टरों की सूची में डॉ. टीएस त्रिपाठी, डॉ. एसके खनिजो, डॉ. बसावड़ा पुराने डॉक्टरों में और नए में डॉ. आनंद सिंह, डॉ. अक्षत श्रीवास्तव शामिल हैं। कहते हैं कि डॉक्टर को सौम्य स्वभाव का होना चाहिए। डॉक्टर सेवा भाव से जाना जाता है जो बिजनेस करते हैं उनकी पहचान भी वैसी ही होती है। डॉ. सूर की सेवाओं पर चिकित्सा जगत को भी गर्व है। डॉ. नवीन शर्मा नि:शुल्क उनके स्वास्थ्य की देखभाल करते हैं।
लंबी उम्र का बताया ये राज
भागदौड़ भरी जिंदगी में लंबी उम्र प्राप्त करना आज के समय में बड़ी चुनौती है लेकिन डॉ. सूर ने जिंदादिली से उम्र को जिया है। 103 वर्ष की उम्र तक पहुंचने का राज खोलते हैं। कहते हैं कि पढ़ाई के दिनों में फुटबाल और बैडमिंटन दो खेल शौक हुआ करते थे। सुबह जल्दी उठना, साफ-सुथरे स्थान में रहना आदत रही। भुजे चने, बारह महीने काली चाय पीना, मछली का सेवन भी दिनचर्या में शामिल रहा। जब तक कदमों ने साथ दिया सुबह मॉर्निंग वॉक किया। रोज १५ किमी. साइकिल चलाकर गोविंदगढ़ तक जाते थे। भले ही उम्र सौ वर्ष से अधिक है पर आज भी शरीर में फुर्ती की कोई कमी नहीं है। मरीज को आला लगाकर देखते हैं और बकायदा बीपी जांच भी करते हैं।