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डॉक्टरी ही नहीं, संगीत के धनी भी हैं डॉ. राज नारायण

रीवा के श्यामशाह मेेडिकल कॉलेज में हैं पदस्थ, बड़े मंचों पर उनके बिना प्रस्तुतियां होती हैं अधूरी

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रीवा

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Dilip Patel

Jul 05, 2018

Dr. Raj Narayana is not only a doctor but also a master of music

Dr. Raj Narayana is not only a doctor but also a master of music

कभी कहा न किसी से तेरे फसाने को
न जाने कैसे खबर लग गई जमाने को...
कमर जलालाबादी की यह गजल जब गायक डॉ. राजनारायण तिवारी की आवाज बनती हैं तो दर्शक दीर्घा तालियों से गूंज जाती है। पेशे से वह भले ही डॉक्टर हैं लेकिन संगीत उनके दिल में बसता है। रीवा के बड़े मंचों पर उनके बिना प्रस्तुतियां अधूरी लगती हैं। प्रदेशभर में बड़े संास्कृतिक मंचों पर न केवल रीवा का नाम रोशन कर रहे हैं बल्कि चिकित्सा जगत के लिए भी गौरव हैं।

रीवा। बचपन का शौक कैसे जिंदगी का हिस्सा बना। यह बात श्यामशाह मेडिकल कॉलेज में पीएसएम विभाग के डॉ. राज नारायण तिवारी ने 'पत्रिकाÓ से साझा की। बताया कि कटनी में बचपन बीता। टेलीविजन पर संगीत को सुनने के बाद घर मेें अकेले गुनगुनाया करते थे। मधुर आवाज सुनकर परिजन मंत्रमुग्ध हो जाते। तभी पिता ने संगीत की तालीम दिलाने की निर्णय लिया। दिल्ली घराने के उस्ताद हिफजुल कबीर खां साहब से क्लासिकल संगीत की शिक्षा ली। स्कूल-कॉलेज में संास्कृतिक कार्यक्रमों में क्लासिकल और सुगम संगीत की प्रस्तुति शुरू हो गई। एमबीबीएस में चयन होने के बाद एक बार लगा कि पढ़ाई के चलते संगीत छूट न जाए लेकि न इससे बड़ी साधना मेरे लिए दूसरी नहीं थी। एमबीबीएस के साथ ही संगीत की शिक्षा जारी रखी। रीवा मेडिकल कॉलेज में अध्ययन के दौरान जीडीसी के प्रो. डॉ. पीएल गोहदेकर से संगीत की शिक्षा ली। संगीत में एमए किया। क्लासिकल गाने, गजल और भजनों की प्रस्तुतियां लोग पसंद करते थे। मेडिकल की पढ़ाई के बाद मेडिकल अफसर की नौकरी गोङ्क्षवदगढ़ में की। डॉक्टरी की व्यस्तता बढ़ गई थी, दिनभर मरीजों और विभागीय कार्यों से फुर्सत मिले तो थकान गुनगुनाने से ही दूर होती। मेडिकल कॉलेज में 2004 में पीएसएम विभाग में ज्वाइनिंग हुई। जिसके बाद कॉलेज के वार्षिक समारोह में गाने लगा। धीरे-धीरे शहर के संास्कृतिक के मंचों पर बुलावा होने लगा। आज रीवा के बड़े मंचों पर गाने का शौक पूरा हो रहा है। डॉ. तिवारी के आदर्श गजल गायक जगजीत सिंह और उस्ताद अमीर खां साहब हैं। वह कहते हैं कि उनकी गजलें, भजन सुनाने में आनंद की अनुभूति होती है।

एम्स दिल्ली में प्रस्तुति से बढ़ा हौसला
डॉ. तिवारी ने कहा कि शुरुआती दौर में एम्स दिल्ली के मंच पर गाने का अवसर मिला। 1995-96 की बात है। यह पल सबसे सुनहरा था क्योंकि एक डॉक्टर को देश के बड़े डॉक्टर सुन रहे थे। क्लासिकल और सुगम संगीत दोनों में गीत सुनाए। एम्स दिल्ली से गोल्ड मेडल सम्मान में मिला। इसके बाद एपीएस विश्वविद्यालय में हुए नेशनल यूनीवर्सिटी कम्पटीशन में दो बार गोल्ड मेडल मिला। यूनीवर्सिटी का कोई भी कार्यक्रम हो मेरी गजल और भजनों की प्रस्तुतियां होती रहीं। डॉ. तिवारी ने कहा कि संगीत साधना के लिए अखिल भारतीय किरण संस्थान कटनी से स्वर श्री की उपाधि मिल चुकी है। उस्ताद अमीर खां स्मृति संगीत समारोह इंदौर और राज्य संगीत समारोह छिंदवाड़ा के मंच पर प्रस्तुतियां यादगार रहीं।

संगीत के बिना जिंदगी होती अधूरी
डॉ. तिवारी कहते हैं कि अगर संगीत उनकी जिंदगी का हिस्सा न होता तो जिंदगी अधूरी हो जाती। संगीत है तो अकेलापन नहीं है। इसमें संवदेनाएं हैं। शांति की तलाश संगीत से पूरी होती है। मन को संतुष्टि मिलती है। खुशी को सबसे सरल साधन है। डॉक्टरी पेशे के साथ संगीत का तालमेल ही है जो बेहतर जिंदगी जीने का आधार बन गया है। हर व्यक्ति को संगीत से लगाव होना चाहिए। गुनगुनाने से बड़ा सा बड़ा गम भूलाया जा सकता है। संगीत की शिक्षा घर की अगली पीढ़ी भी ले रही है। बेटा शुभ तिवारी और शौर्य तिवारी इस विरासत को बढ़ाने के लिए तत्पर हैं। लेकिन वे गिटार के साथ आधुनिक विधा को अपना रहे हैं।