
रीवा। रक्तदान की तरह ही नेत्रदान को लेकर भी भले ही तमाम तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हो। लेकिन नतीजा सिफर है। लोगों की संवेदना अभी भी सो रही है। दिवंगत होने के बाद लोग नेत्रदान करने को तैयार नहीं हैं। ऐसे लोगों की संख्या नहीं के बराबर है, जो मरणोपरांत नेत्रदान करने को तैयार हैं।
नहीं मिल रहा कोई दानदाता
नेत्रदान से संबंधित चिकित्सकों की माने तो जिले में ऐसे दृष्टिबाधितों की संख्या छह हजार के करीब है, जिन्हें कोई दानदाता मिले तो उनकी जिंदगी रोशन हो सके। लेकिन अफसोस की बात यह है कि पिछले तीन वर्षों में नेत्रदान करने वालों की संख्या केवल 42 रही है। नतीजा तीन वर्षों में यहां जिले के महज 59 जरूरतमंदों को नेत्र ट्रांसप्लांट किया जा सका है। बाकी के दान किए गए नेत्रों में समस्या होने के चलते उन्हें चित्रकूट नेत्र चिकित्सालय भेज दिया गया।
किसी ने खुद से नहीं जताई इच्छा
संजय गांधी अस्पताल की नेत्ररोग विशेषज्ञ डॉ. शशि जैन भी यह स्वीकार करती हैं कि नेत्रदान के लिए खुद से लोग आगे नहीं आ रहे हैं। इधर तीन वर्षों से नेत्रदान करने वालों की संख्या में कुछ इजाफा हुआ है। लेकिन ज्यादातर मामलों में स्वयंसेवी संस्थाओं का प्रयास रहा है। फिर भी ज्यादातर नेत्रदान करने वालों में केवल बुजुर्ग ही हैं।
मरणोपरांत ही आती है सूचना
नेत्रदान के ज्यादातर मामले में दान करने की सूचना मरणोपरांत ही आई है। पहले से ही दान करने के लिए संकल्प पत्र भरे जाने का प्रावधान है। संकल्प पत्र भरने वालों की संख्या तो काफी अधिक है। लेकिन हकीकत में नेत्रदान करने वाले बहुत कम लोग होते हैं। लोगों में अंधविश्वास जैसी भावनाओं की प्रबलता मुख्य रूप से आड़े आती हैं।
फैक्ट फाइल :-
06 हजार दृष्टिबाधितों की संख्या
42 लोग ने तीन वर्ष में किया नेत्रदान
59 दृष्टिबाधितों में नेत्र ट्रांसप्लांट हुआ
04 सौ ने नेत्रदान का भरा है संकल्प