सम्भल

क्या आंकड़ों से मिटाई जा रही है गरीबी? सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने सरकार के दावों को बताया भ्रम का खेल

Sambhal News: यूपी के संभल से सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने बजट 2026 में सरकार के गरीबी उन्मूलन के दावों पर सवाल उठाते हुए कहा कि परिभाषा बदलकर आंकड़ों के जरिए गरीबों को कागजों से गायब किया जा रहा है।

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Feb 02, 2026
क्या आंकड़ों से मिटाई जा रही है गरीबी? | Image - X/@barq_zia

Ziaur Rahman Barq on Poverty Definition: संभल से समाजवादी पार्टी (सपा) के सांसद जियाउर्रहमान बर्क ने केंद्रीय बजट 2026 को लेकर सरकार के गरीबी उन्मूलन संबंधी दावों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

उन्होंने वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा 25 करोड़ लोगों के गरीबी रेखा से बाहर आने के बयान को भ्रामक करार देते हुए कहा कि यह दावा जमीनी सच्चाई से मेल नहीं खाता। बर्क के अनुसार, सरकार वास्तविक समस्याओं को हल करने के बजाय आंकड़ों के जरिए तस्वीर को बेहतर दिखाने की कोशिश कर रही है।

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गरीबी की परिभाषा बदलने का आरोप

सांसद बर्क ने आरोप लगाया कि सरकार गरीबी को कम करने के बजाय उसकी परिभाषा ही बदल रही है। उन्होंने कहा कि यदि मानक ही इतने नीचे तय कर दिए जाएं कि न्यूनतम आय पर जीवन यापन करने वाले लोग भी गैर-गरीब माने जाने लगें, तो आंकड़ों में गरीबी अपने आप घटती हुई दिखाई देगी। बर्क ने इसे गरीबों के जीवन की वास्तविक चुनौतियों से आंख मूंदने के समान बताया।

सोशल मीडिया पर उठाए आय मानकों पर सवाल

अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स पर बयान साझा करते हुए बर्क ने मौजूदा मानकों का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि शहरी क्षेत्रों में ₹1,944 प्रतिमाह और ग्रामीण क्षेत्रों में ₹1,632 प्रतिमाह आय वाले व्यक्ति को अब गरीब नहीं माना जा रहा है। बर्क ने सवाल उठाया कि इतनी सीमित आय में कोई व्यक्ति सम्मानजनक जीवन, शिक्षा, स्वास्थ्य और आवास जैसी बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी कर सकता है।

कागजों से गायब किए जा रहे हैं गरीब

बर्क ने अपने बयान में कहा कि जब गरीब की परिभाषा ही बेहद नीचे तय कर दी जाए, तो आंकड़ों में गरीबी खत्म होती नजर आती है। उन्होंने टिप्पणी करते हुए कहा कि यह गरीबी का वास्तविक अंत नहीं, बल्कि गरीबों को कागजों से गायब करने जैसा है। उनके अनुसार, यह प्रक्रिया जनता को भ्रमित करने का एक तरीका बनती जा रही है।

बजट को बताया सिर्फ आंकड़ों का बजट

सांसद बर्क ने बजट 2026 को “सिर्फ आंकड़ों का बजट” बताते हुए कहा कि इसमें गरीबों, किसानों, महिलाओं, युवाओं, अल्पसंख्यकों और आम नागरिकों के लिए कोई ठोस और दूरगामी योजना नजर नहीं आती। उन्होंने दावा किया कि बजट में ऐसे प्रावधानों की कमी है जो सीधे तौर पर रोजगार, महंगाई नियंत्रण और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत कर सकें।

राजनीतिक बहस और जनचर्चा तेज

बर्क के बयान के बाद राजनीतिक हलकों में बहस तेज हो गई है। विपक्षी दलों ने भी सरकार से गरीबी के आंकड़ों और मानकों को लेकर स्पष्टता की मांग की है। वहीं, आम जनता के बीच भी इस मुद्दे पर चर्चा शुरू हो गई है कि क्या सरकारी दावे वास्तव में जमीनी हकीकत को दर्शाते हैं या केवल सांख्यिकीय गणना तक सीमित हैं।

Updated on:
02 Feb 2026 12:27 pm
Published on:
02 Feb 2026 12:25 pm
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