सतना

एक प्रोफेसर जो तपती दोपहर में पेड़ों की प्यास बुझाती हैं, बारिश में गिरें तो सहारा बन जाती हैं

डॉ रूपा सिह... जब किसी पेड़ की तबियत खराब होती है तो तत्काल दवा लेकर इलाज को पहुंच जाती हैं। बंजर कॉलेज परिसर को हरा भरा कर दिया। कुछ ऐसी है उनकी कहानी...
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Jul 27, 2026
rupa

सतना। किसी के लिए पेड़ हरियाली हैं, किसी के लिए पर्यावरण बचाने का माध्यम। लेकिन शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय सतना की रसायन शास्त्र की प्रोफेसर डॉ. रूपा सिंह के लिए पेड़ परिवार के सदस्य जैसे हैं। गर्मी में जब पौधे प्यास से सूखने लगते हैं तो वे कार में पानी भरकर उन्हें सींचने निकल पड़ती हैं। बारिश में कोई पौधा गिर जाए तो उसे सहारा देने तुरंत पहुंच जाती हैं। यदि किसी पौधे में बीमारी दिख जाए तो दवाइयों की किट लेकर उसका इलाज करने निकल जाती हैं। पिछले एक दशक से उनका यही मौन संकल्प है कि पौधे केवल लगाना नहीं, उन्हें बड़ा भी करना है।

बंजर कॉलेज परिसर को रहा भरा करने की बेचैनी

वर्ष 2013 में जब शासकीय स्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय का परिसर इंदिरा कॉलेज से गहरा नाला स्थित वर्तमान भवन में स्थानांतरित हुआ, तब पूरा परिसर लगभग बंजर था। तेज हवा के साथ उड़ती धूल और दूर-दूर तक हरियाली का अभाव उन्हें भीतर तक बेचैन करता था। तभी उन्होंने तय किया कि इस सूने परिसर को हरे-भरे वन जैसे वातावरण में बदलना है। इसके बाद उनकी दिनचर्या बदल गई। सुबह छह बजे कॉलेज पहुंचना, पौधों को पानी देना, निदाई-गुड़ाई करना, खाद डालना और चुपचाप लौट आना उनकी आदत बन गई। आज उसी परिसर में सैकड़ों पेड़ छाया दे रहे हैं और विद्यार्थियों को प्रकृति से जुड़ने की प्रेरणा भी। डॉ. रूपा सिंह कहती हैं, मेरा उद्देश्य हजारों पौधे लगाना नहीं, बल्कि उतने पौधे लगाना है जिन्हें मैं बचा सकूं। पेड़ तभी सार्थक हैं जब वे बड़े होकर लोगों को छांव और स्वच्छ हवा दें।

गर्मी में कार बन जाती है 'जल वाहन'

भीषण गर्मी में यदि कहीं सूखते पौधे दिखाई दे जाएं तो वे अपने पति के साथ कार में पानी के डिब्बे भरकर वहां पहुंच जाती हैं। एक बार पानी खत्म हो जाए तो दोबारा घर लौटकर पानी भरती हैं और फिर उसी स्थान पर पहुंचकर पौधों की प्यास बुझाती हैं। कई बार दो-तीन चक्कर लगाने पड़ते हैं, लेकिन वे इसे अपना दायित्व मानती हैं।

बैग में किताबों के साथ रहती है खुरपी और कैंची

डॉ. रूपा के बैग में अक्सर खुरपी और कैंची रहती है, जबकि कार में हमेशा पानी के चार डिब्बे, कीटनाशक और फफूंदनाशक दवाएं मौजूद रहती हैं। किसी भी जिले या कॉलेज में परीक्षा अथवा शैक्षणिक कार्य से जाना हो, वहां एक छायादार या फलदार पौधा लगाना वे नहीं भूलतीं। इसके बाद फोन कर नियमित उसका हालचाल भी पूछती रहती हैं। यदि पता चले कि पौधा बीमार है या उसकी बढ़वार रुक गई है तो स्वयं वहां पहुंचकर उपचार करती हैं।

बेटे की तबीयत खराब थी, फिर भी पहले संभाला गिरा हुआ पौधा

बरसात की शुरुआत का एक प्रसंग उन्हें आज भी भावुक कर देता है। घर में बेटा बीमार था। तभी सूचना मिली कि कॉलेज परिसर में लगाया गया एक पौधा तेज बारिश में गिर गया है। वे तुरंत स्कूटी निकालने लगीं। बेटे ने कारण पूछा तो उन्होंने कहा, पौधा गिर गया है, उसे देखने जाना है। बेटे ने खुद की तबीयत खराब होने के बावजूद कार निकाली और मां को कॉलेज लेकर पहुंचा। वहां दोनों ने मिलकर पौधे को सीधा किया, सहारा बांधा और तब लौटे, जब यह भरोसा हो गया कि वह फिर खड़ा हो जाएगा।

पूरा परिवार बन गया हरियाली अभियान का साथी

डॉ. रूपा सिंह के पौधों के प्रति समर्पण ने उनके पूरे परिवार को इस अभियान से जोड़ दिया है। उनके पति डॉ देवेन्द्र सिंह जो सेवानिवृत्त सर्जन हैं, हर पौधारोपण और देखभाल में सहयोग करते हैं। डॉक्टर बेटा डॉ अभिषेक भी समय मिलने पर उनके साथ पौधों की सेवा में जुट जाता है। अब वे महाविद्यालय के विद्यार्थियों को भी इस अभियान से जोड़ रही हैं। उनका मानना है कि पौधारोपण एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि वर्षों तक निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है। यही कारण है कि उनके लगाए पौधे आज केवल हरियाली नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, धैर्य और प्रकृति के प्रति समर्पण की जीवंत मिसाल बन चुके हैं।

डिग्री कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ प्रदीप मिश्रा बताते हैं कि खरी दुपहरिया, जब दूर-दूर तक सन्नाटा छाया होता है। आदमी नहीं दिखाई देता। धूप-धूल धूम मचाते हैं। पेड़ प्यास से पानी के लिए तड़पते हैं। मुर्झा कर कुबड़े हो जाते हैं। ऐसे में एक विदुषी महिला उनके मौन को समझती है।

Updated on:
27 Jul 2026 10:19 am
Published on:
27 Jul 2026 10:19 am