1897 में हुई थी श्री बिहारी रामलीला की स्थापना, पहले सजावट का समान ठेलों से आता था
सतना। श्री बिहारी रामलीला समाज द्वारा मंचन के दूसरे दिन दिखाया गया कि मनु और सतरूपा तपस्या करते है जिसमे लक्ष्मी नारायण प्रसन्न होकर वरदान देते है कि आपके यह मानव के रूप में जन्म लेके दुष्टों का नाश करूंगा, वहीं दूसरी ओर रावण जन्म हुआ और रावण का अत्याचार सृष्टि में बढऩे लगता है। मेघनाथ भी अपने अहंकार में मदमस्त होकर स्वर्ग में विजय प्राप्त करने के लिए आक्रमण करने लगता है, जिससे ऋ षि मुनि देवी देवता सब भयभीत हो जाते है तब सृष्टि में इन पापों के बढ़ते भार से पीडि़त होकरसभी नाग, किन्नर, देवी देवता, ऋ षि मुनि और मां पृथ्वी गाय का रूप बनाकर ब्रह्माजी के पास वंदन करने और रावण के अत्यचार से मुक्ति के लिये प्रार्थना करते है।
स्वरूप के किरदार को सम्मान
श्रीराम लीला के मंचन के दौरान छोटा-बड़ा से अधिक स्वरुप के किरदार का महत्व है। श्रीराम का मुकुट धारण करने वाले को भगवान की तरह सम्मान मिलता है। यह व्यवस्था प्रांरभ से निरंतर चली आ रही है। पांच प्रमुख किरदार निभाने वालों में श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, जानकी एवं हनुमानजी को बीस दिवस विशेष सम्मान दिया जाता है।
नए स्वरूप में बिहारी रामलीला
सहमंत्री आशुतोष दुबे ने बताया कि कई वर्षों बाद पूर्वजों के आशीर्वाद एवं सभी के सहयोग से श्रीबिहारी रामलीला के मंचन को नए इफेक्ट देने की कोशिश की जा रही है। साउण्ड इफेक्ट का उपयोग करते हुए विजुअल इफेक्ट देने का प्रयास किया जा रहा है। इस बार संगीत का इफेक्ट नए रूप में दिया जा रहा है। नए इफेक्ट के लिए हमारे कुछ युवा साथी अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
नियम बदले, सम्मान नहीं
श्रीहनुमान का किरदार निभाने वाले कलाकार को ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है। प्रारंभ में सभी कलाकारों को श्रीबिहारी मंदिर में रहकर सभी नियमों का पालन करते हुए रामलीला का मंचन करना पड़ता था। आज भी इन्ही नियमों का पालन होता है। समय के साथ कुछ नियम बदले हैं लेकिन सम्मान नहीं बदला है। हनुमान का पात्र अदा करने वाले को दैनिक जीवन में भी बीस दिवस ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता है।