सतना

satna: जब जिपं अध्यक्ष ने पास कर दिया था कलेक्टर के निलंबन का प्रस्ताव

पंचायत राज व्यवस्थाः तत्कालीन अध्यक्ष ने अपने रहने के लिए मांग लिया था कलेक्टर का बंगला
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Updated: 20 Jun 2022, 11:53 AM IST
satna: जब जिपं अध्यक्ष ने पास कर दिया था कलेक्टर के निलंबन का प्रस्ताव
satna: When ZP president passed the proposal for suspension of the collector

सतना। वर्ष 1994... प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था का पहला कार्यकाल... सतना के पहले जिला पंचायत अध्यक्ष धीरेन्द्र सिंह धीरू चुने गए। उस वक्त पंचायत राज संस्थाओं को व्यापक अधिकार मिले थे। पंचायत राज व्यवस्था के पदाधिकारियों ने इसे अपने अधिकार में निहित बताना शुरू कर दिया था। हालात यह हो गये थे कि उस दौर में किसी भी योजना का लाभ बिना पंचायत राज संस्थाओं की अनुमति के बगैर नहीं मिल सकते थे। मंत्री, सांसद, विधायक तक अधिकार के मामले में जिपं अध्यक्ष के सामने बौने साबित होने लगे थे। स्थिति यह थी कि स्वास्थ्य महकमें में दवाओं की खरीदी हो या हैण्डपंप लगवाना हो सब कुछ जिला पंचायत संस्थाओं के हाथ था। नतीजा यह हुआ कि इस व्यवस्था का मंत्रियों ने मुख्यमंत्री से खुल कर विरोध जताया। तब स्थितियों को देखते हुए समन्वय स्थापित करने जिला योजना समिति का गठन किया गया और इसका अध्यक्ष प्रभारी मंत्री को बनाया गया। तब जाकर स्थितियां कुछ ठीक हुईं। लेकिन सतना जिला पंचायत में पहले कार्याकाल के दौरान ऐसी घटनाएं हुई कि इसकी गूंज पूरे प्रदेश तक में हुई।

अपने लिये मांग लिया था कलेक्टर आवास

तब की पंचायत राज व्यवस्था को करीब से देखने वाले एक अधिकारी ने बताया कि उस दौर में जिला पंचायत अध्यक्ष के पास व्यापक अधिकार थे। इसी दौरान अध्यक्ष ने अपने निवास के लिये कलेक्टर बंगले की मांग कर दी थी। कहा था कि जिपं अध्यक्ष कलेक्टर बंगले में रहेगा और अपने आवास के लिये कलेक्टर बंगला ही चाहिए। इसके बाद से तत्कालीन कलेक्टर प्रसन्नदास और तत्कालीन जिपं अध्यक्ष धीरू में तनातनी की स्थितियां बन गई थीं।

कलेक्टर के निलंबन का प्रस्ताव

कलेक्टर की जिपं अध्यक्ष से तनातनी होने के बाद कलेक्टर प्रसन्न दास ने जिला पंचायत की बैठकों में आना बंद कर दिया था। इसी बीच सामान्य प्रशासन समिति की बैठक हुई। जिसमें कलेक्टर अनुपस्थित थे और उनका कोई प्रतिनिधि भी नहीं था। इसको देखते हुए जिपं अध्यक्ष ने कलेक्टर के निलंबन का प्रस्ताव भी पारित करवा दिया था। मामले की गंभीरता को उस वक्त के जिपं सीईओ भी नहीं समझ पाए थे और उन्होंने भी इस पर हस्ताक्षर कर दिये थे।

अर्जुन सिंह के खिलाफ अवमानना का प्रस्ताव

उस वक्त सांसद अर्जुन सिंह हुआ करते थे। वे जिला पंचायत में कोई रुचि नहीं रखते थे। लिहाजा जिला पंचायत की बैठक में न तो वे जाते थे न ही कोई अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया था। ऐसे में सामान्य सम्मेलन की बैठक में उनकी लगातार अनुपस्थिति को देखते हुए तत्कालीन जिपं अध्यक्ष ने सांसद सिंह के खिलाफ अवमानना का प्रस्ताव डालते हुए नोटिस जारी करने के निर्देश दे दिये थे।

और नहीं आया मार्गदर्शन

यह मामला काफी चर्चा में रहा और काफी बाद में जब सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुआ तब इस कार्यकाल के सामान्य सम्मिलन और सामान्य प्रशासन की प्रोसीडिंग सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई। जानकारी तैयार कर जब यह तत्कालीन जिपं सीईओ विजय आनंद कुरील के पास पहुंची और उन्होंने यह घटनाएं प्रोसिडिंग में देखी तो वे चौंक गए। इसके बाद उन्होंने इस जानकारी को दिया जाए या नहीं इसको लेकर शासन से मार्गदर्शन मांग लिया और उसका मार्गदर्शन उनके कार्यकाल तक नहीं आया और इस तरह से आधिकारिक जानकारी सामने आने से वंचित रह गई।

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20 Jun 2022, 11:53 AM IST
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