सालभर के बड़े कार्यक्रमों ने दिलाई सतना को पहचान
सतना। साल 2017 कई बड़ी उपलब्धियां देकर विदा होने की कगार पर है। वर्षभर हुए बड़े कार्यक्रमों ने शहर को पहचान दिलाई है। भगवान परशुराम की 15 फीट की प्रतिमा स्थापित कर प्रदेश के पटल पर अपनी छाप छोड़ी है। शहर में पहली बार भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाली गई तो 120 वर्ष पुरानी रामलीला में आधुनिकता का रंग चढ़ाया गया।
दिगंबर जैन समाज ने 108 कारों की रैली निकाल कर मिसाल पेश की। विंध्य की सबसे ज्यादा दिवस की समाधि साधना सतना के नाम रही। शहर के युवाओं में धार्मिक आस्था जगाने के लिए पहली बार अंग्रेजी में सत्संग का आयोजन किया गया। 41 साल बाद सतना की धरती पर 150 से अधिक लेखकों का जमावड़ा लगा।
1897 से शुरू रामलीला आज भी 'जिंदा'
शहर की 120 साल पुरानी रामलीला सोशल हो गई। इस बार रामलीला फेसबुक पेज 'श्रीबिहारी रामलीला सन् 1897 पर प्रतिदिन लाइव दिखाई गई। मंचन को भी नया इफेक्ट दिया गया। साउंड और विजुअल के उपयोग से इसे और आकर्षक बनाया गया। बता दें कि श्रीबिहारी रामलीला समाज की प्रथम रामलीला बिहारीजी मंदिर के सामने महंत वृंदावन दास के मार्गदर्शन में सन 1897 में शुरूकी थी। कुछ वर्ष बाद सुभाष पार्क में आयोजन होने लगा, जो निरंतर जारी है। रामलीला के मंचन में ३५ कलाकार हैं, जो दिन में नौकरी करने के बाद रात को मंचन करते हैं। कुछ कलाकार तो रीवा से मंचन करने आते हैं। रामलीला मंचन को बांधने का काम स्व. रामप्रसाद परौहा की तीसरी पीढ़ी ने किया।
सतना की धरती पर जुटे नामचीन 150 लेखक
16 सितंबर का दिन सतना के लिए ऐतिहासिक रहा। करीब 41 साल बाद जिले की धरती पर 150 से अधिक नामचीन लेखकों का जमावड़ा लगा। इससे पहले 1976 में फॉसिस्ट विरोधी लेखकों का जमावड़ा लगा था, जब आपातकाल चरम पर था। देशभर से आए लेखकों ने 'भूखंड तप रहा हैÓ विषय पर दो दिन तक मंथन किया। प्रगतिशील लेखक संघ के तत्वावधान में हुए मंथन में बेंगलूरु में पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या का मामला गंभीरता से उठा। महंगाई, बेरोजगारी, किसान आत्महत्या से लेकर इनटोलरेंस के मुद्दों को लेकर सत्ता पर तीखे सवाल दागे गए। तर्कवादियों और विचारकों की हत्या से बिफरे लेखकों के निशाने पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद रहा। मुक्तिबोध जन्म शती के अवसर पर सम्मेलन स्थल को मुक्तिबोध परिसर का नाम दिया गया।
ब्राह्मण समाज का पहला परिचय सम्मेलन
ब्राह्मण समाज का विंध्य का पहला परिचय सम्मेलन सतना के टाउन हाल में 3 दिसंबर को आयोजित कराया गया। सम्मेलन में पन्ना, रायपुर (छग), छतरपुर, सूरजपुर (छग), अंबिकापुर (छग), रीवा, महाराष्ट्र से युवक-युवती पहुंचे। 55 युवक-युवतियों का पंजीयन हुआ।
जब पहली बार निकले भगवान जगन्नाथ
12 अगस्त का दिन शहर के लिए खास रहा। इस्कॉन के तत्वावधान में पहली बार भगवान जगन्नाथ की यात्रा निकाली गई। भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा एवं बलराम के रथ को खींचने के लिए शहरियों में होड़ लगी रही। खास बात यह रही कि इस यात्रा में विदेशी चमक भी देखने को मिली। महोत्सव में अमरीका, स्पेन, रूस और जर्मनी के भक्त शामिल हुए। पहली बार किसी यात्रा का मोबाइल से फेसबुक लाइव किया गया। भगवान जगन्नाथ के रथ को कोलकाता के 15 कलाकारों ने मूर्तरूप दिया। इसके लिए 12 फीट का गर्भगृह बनाया गया।
भगवान परशुराम की सबसे बड़ी प्रतिमा
शहर के बदखर में 29 अप्रैल को प्रदेश की सबसे बड़ी भगवान परशुराम की प्रतिमा स्थापित की गई। प्रतिमा की ऊंचाई 15 फीट की है। गौरतलब है कि अब तक भगवान परशुराम की सबसे ऊंची प्रतिमा पुणे में स्थापित है, जिसकी ऊंचाई 21 फीट है। सतना में स्थापित प्रतिमा देश की देश में दूसरी सबसे बड़ी प्रतिमा है। प्रतिमा को बनाने में कांक्रीट और लोहे का उपयोग किया गया है। 06 मजदूरों ने 40 दिन में इसका निर्माण पूरा किया है। इसकी लागत करीब 4.50 लाख रुपए आई है।
निकाली गई 108 कारों की रैली
राष्ट्रसंत आचार्य विद्यासागर महाराज के जन्मदिन पर दिगंबर जैन समाज द्वारा अक्टूबर माह में कई कार्यक्रम आयोजित किए गए। इनमें सबसे खास रहा समाज द्वारा पहली बार निकाली गई 108 कार की रैली। राष्ट्रसंत का संदेश जन-जन तक पहुंचाने के लिए 5 अक्टूबर को समाज ने कार रैली निकाली। नवयुवक मंडल द्वारा निकाली गई रैली पॉवर हाउस से शुरू हुई, जो अहिंसा चौक, बिहारी चौक, कोतवाली चौक, धवारी चौक, सेमरिया चौक, कृष्णनगर होते हुए पुराने पॉवर हाउस में समाप्त हुई।
सबसे ज्यादा दिवस की समाधि साधना
विंध्य की सबसे ज्यादा दिन की समाधि साधना दादा शीलचंद्र जैन की रही। 99 दिन की संलेखना के बाद दादा शीलचंद्र ने देह त्यागी। दादा शीलचंद्र की समाधि यात्रा इंदौर से शुरू हुई थी। गुरु के निर्देशानुसार 24 मार्च 2017 से अन्न-जल का त्याग किया। पहले अन्न त्यागा और 56 दिन तक केवल एक बार जल ग्रहण करते थे। उसके बाद जल भी त्याग दिया था। वे 10 साल से एक समय ही भोजन ग्रहण करते थे। दादा ने 10 प्रतिमाधारी व्रत भी किए थे। 25 जून को 77 वर्ष की उम्र में दादा ने अंतिम सांस ली।
युवाओं के लिए पहली बार अंग्रेजी में सत्संग
युवाओं को जोडऩे के मकसद से २ सितंबर को पहली बार अंग्रेजी भाषा में सत्संग हुआ। युवा संत मनीष गौतम ने इस नई परंपरा की शुरुआत की। संत निरंकारी भवन में करीब ढाई घंटे तक प्रवचन चला। संत मनीष ने कविता, नाट्य स्तुति, प्रवचन, गीत गायन एवं अवतार वाणी का वाचन अंग्रेजी भाषा में किया। कार्यक्रम के संयोजक प्रो. जगदीश प्रसाद सेवानी रहे। बतौर सेवानी वे काफी दिनों से महसूस कर रहे थे कि सत्संग में युवाओं की उपस्थित कम हो रही है। जब उन्होंने इसका अध्ययन किया तो पाया कि युवाओं की बोलचाल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों की अधिकता है। वे अपने व्हाट्सग्रुप, फेसबुक पर अंग्रेजी शब्दों का उपयोग ज्यादा कर रहे हैं।